छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित ‘AI मंथन 2.0’ में कृषि वैज्ञानिकों ने देशव्यापी ‘केंद्रीय कृषि डेटा लेक’ की आवश्यकता पर बल दिया। जानिए AI से कैसे बदलेगी भारतीय खेती की तस्वीर।
विशेष रिपोर्ट | EduTech Bharat
कानपुर: छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) में आयोजित ‘एआई मंथन 2.0’ के दूसरे दिन विशेषज्ञों ने भारतीय कृषि को डेटा-संचालित और स्मार्ट बनाने के लिए एक बड़े नीतिगत बदलाव की वकालत की। सत्र में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि भारत की भौगोलिक और जलवायु संबंधी विविधता को देखते हुए अब बिखरे हुए आंकड़ों के बजाय एक ‘केंद्रीय कृषि डेटा लेक’ (Central Agriculture Data Lake) विकसित करने की सख्त दरकार है।
’समानांतर सत्र: कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI for Agriculture)’ के दौरान आईसीएआर (ICAR), आईएएसआरआई (IASRI) और विभिन्न विश्वविद्यालयों के शीर्ष वैज्ञानिकों ने रेखांकित किया कि जब तक मौसम, मिट्टी, सेंसर, सैटेलाइट और फील्ड स्तर के आंकड़े एक साझा सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर एकीकृत नहीं होंगे, तब तक किसानों को सटीक और समयबद्ध सलाह देना संभव नहीं होगा।
बिखरे डेटा को जोड़कर बनेगा ‘एकीकृत कृषि इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म’
आईसीएआर (ICAR), नई दिल्ली के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. कृष्ण कुमार चतुर्वेदी ने ‘ट्रेडिशनल फार्मिंग टू डेटा-ड्रिवन प्रिसिजन एग्रीकल्चर’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि कृषि 4.0 से आगे बढ़कर अब देश को ‘कृषि 5.0’ की ओर बढ़ना होगा।CSJMU AI Manthan
- डेटा साइलो से मुक्ति: वर्तमान में मौसम, मिट्टी परीक्षण, सैटेलाइट इमेजरी और मंडी भाव के डेटा अलग-अलग विभागों में बिखरे हुए हैं।
- केंद्रीय डेटा लेक का लाभ: एक साझा केंद्रीय प्लेटफॉर्म बनने से रियल-टाइम निर्णयों के लिए ‘डिजिटल ट्विन’ तकनीक और डेटा में पारदर्शिता व ट्रेसबिलिटी के लिए ब्लॉकचेन का प्रभावी इस्तेमाल हो सकेगा।
- इंटेलिजेंट इरिगेशन: मिट्टी की नमी, जड़ क्षेत्र की गहराई और मौसम पूर्वानुमान को मिलाकर किसान को यह सटीक जानकारी मिलेगी कि कब और कितनी सिंचाई की जरूरत है।
जलवायु संकट और जल संकट में किसानों की ढाल बनेगा AI
श्रीराम हिमालय विश्वविद्यालय, देहरादून के प्रो. (डॉ.) नील मणि ने बताया कि घटती कृषि भूमि, जलवायु परिवर्तन और औद्योगिकीकरण के दौर में खाद्य उत्पादन बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है।
- चार स्तरीय आर्किटेक्चर: कृषि तकनीक को चार स्तरों—डेटा व सेंसर, एआई/एमएल मॉडल, यूजर एप्लीकेशन और फील्ड स्तर—पर विकसित करना होगा।
- लोकल लैंग्वेज और वॉयस इंटरफेस: इंटरनेट और स्मार्टफोन की बदौलत किसान अपनी स्थानीय बोली में बोलकर कीट, रोग या सिंचाई से जुड़ी समस्याओं का तुरंत समाधान पा सकते हैं।
- सरल और कम लागत वाले मॉडल: प्रो. नील मणि ने रेखांकित किया कि हर समस्या के लिए महंगे मॉडल की जरूरत नहीं है; छोटे और व्यावहारिक एआई मॉडल मिट्टी के भौतिक गुणों, फसल की परिपक्वता (ग्रीन पिक्सल एनालिसिस) और उपज का सटीक पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हैं।

फसल निगरानी से लेकर पशुधन सुरक्षा तक AI के व्यावहारिक मॉडल
सत्र में वैज्ञानिकों ने फील्ड में इस्तेमाल हो रहे कई सफल एआई टूल्स की तकनीकी कार्यप्रणाली साझा की:
- नाइट्रोसेंस-एआई (NitroSense-AI): गेहूं की पत्तियों की तस्वीर और बुनियादी डेटा अपलोड कर किसान यह जान सकते हैं कि फसल में नाइट्रोजन की कमी है या अधिकता। इसके लिए मल्टीमॉडल डीप लर्निंग और सीएनएन (CNN) मॉडल का इस्तेमाल होता है।
- पत्तियों के रोग की पहचान: शहतूत व अन्य फसलों में एफिशिएंट नेट वीटू (EfficientNetV2) आर्किटेक्चर से बैकग्राउंड हटाकर रोगों के सटीक लक्षण पहचाने जा रहे हैं।
- पशुओं में मास्टाइटिस जांच: इंफ्रारेड थर्मोग्राफी के जरिए पशु के थन की सतह के तापमान की थर्मल तस्वीर लेकर बिना किसी दर्दनाक जांच (Non-invasive) के शुरुआती स्तर पर ही बीमारी का पता लगाया जा सकता है।#Artificial_Intelligence
’ब्लैक बॉक्स’ नहीं, भरोसेमंद एक्सप्लेनेबल AI की जरूरत
आईसीएआर-आईएएसआरआई (ICAR-IASRI) के प्रधान वैज्ञानिक एवं नेशनल फेलो डॉ. रंजीत कुमार पॉल ने ‘टाइम सीरीज टू इंटेलिजेंस’ पर बोलते हुए मौसम व बाजार पूर्वानुमान की बारीकियों को समझाया।
- मंडी भाव और मौसम का सटीक अनुमान: वेवलेट-एसवीआर (Wavelet-SVR), वेवलेट-एलएसटीएम (LSTM) और ग्राफ न्यूरल नेटवर्क के जरिए अंतर-मंडी कीमतों और अनिश्चित मानसूनी पैटर्न का सटीक विश्लेषण संभव है।
- एक्सप्लेनेबल एआई (XAI): किसानों और नीति निर्माताओं के भरोसे के लिए यह आवश्यक है कि एआई केवल परिणाम न बताए, बल्कि यह भी स्पष्ट करे कि वह उस निष्कर्ष तक किस आधार पर पहुंचा।
- नीतिगत फैसलों में सहायता: बुवाई से लेकर आपदा के बाद सैटेलाइट व ड्रोन से फसल नुकसान का आकलन करने और फसल बीमा दावों के त्वरित निपटारे में एआई मॉडल निर्णायक साबित हो रहे हैं।IIT-Kanpur-launches-online-course-on-Python-programming-346860988.jpg
निष्कर्ष: तकनीक से निर्णय तक का सफर
मंथन सत्र का स्पष्ट संदेश रहा कि कृषि में तकनीक का अंतिम लक्ष्य किसान की लागत घटाना और मुनाफा बढ़ाना है। केंद्रीय डेटा लेक और किसान-केंद्रित वॉयस ऐप्स के जरिए भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर, टिकाऊ और जलवायु-सक्षम बनाया जा सकता है।
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