- एआई को सेवक और सहायक के रूप में इस्तेमाल करें, उसे मनुष्य का मालिक न बनने दें: प्रो. वी. रामगोपाल राव
- एआई के साथ हार्डवेयर और साइबर सुरक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी: विशाल चहल
- मुफ्त सामग्री भले ही प्रसारण की तरह हो, लेकिन मुफ्त कोचिंग केवल प्रसारण नहीं हो सकती: प्रो. अमय करकरे
कानपुर (edutechbharat.com): छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) में आयोजित दो दिवसीय ‘एआई मंथन 2.0’ के समापन सत्र में देश के अग्रणी शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों ने उच्च शिक्षा, कृषि, प्रतियोगी परीक्षाओं और शहरी प्रबंधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की।
सत्र के मुख्य वक्ताओं में शामिल आईबीएम (IBM) के तकनीकी विशेषज्ञ विशाल चहल ने भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों के बुनियादी ढांचे में बदलाव की वकालत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों को अब पारंपरिक कंप्यूटर लैब्स के दायरे से बाहर निकलकर ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (Center of Excellence – CoE) स्थापित करने होंगे।
विश्वविद्यालयों में सिर्फ लैब नहीं, ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ और लाइव डिप्लॉयमेंट जरूरी
तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए आईबीएम के विशाल चहल ने कहा कि भारत में तकनीकी क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन मौजूदा समय में देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘एआई एडॉप्शन’ और ‘टैलेंट गैप’ की है।
- प्रतिभा और स्किलिंग: भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रामक पैमानों पर खुद को आंकने के बजाय बड़े पैमाने पर एआई-साक्षर प्रतिभा तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य की विशाल छात्र आबादी को देखते हुए इसे देश का सबसे बड़ा ‘एआई स्किलिंग हब’ बनाया जा सकता है।
- सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की दरकार: चहल ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में केवल कंप्यूटर या एआई लैब बना देना पर्याप्त नहीं है। संस्थानों को इंडस्ट्री के साथ साझेदारी में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ बनाने चाहिए, जहां छात्र वास्तविक समस्याओं पर काम कर सकें और तकनीकों का ‘लाइव डिप्लॉयमेंट’ देख सकें।
- सॉवरन एआई और साइबर सुरक्षा: भारत के तकनीकी भविष्य के लिए सॉवरन एआई (Sovereign AI) को अपरिहार्य बताते हुए उन्होंने कहा कि देश को स्थानीय डेटा, स्थानीय मॉडल, हार्डवेयर और सुरक्षित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि एआई मॉडल के विकास के साथ-साथ हार्डवेयर की मजबूती और साइबर सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान देना होगा, ताकि तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।
एआई को सेवक और सहायक बनाएं, मालिक नहीं: प्रो. वी. रामगोपाल राव
बिट्स पिलानी के कुलपति एवं प्रख्यात शिक्षाविद प्रो. वी. रामगोपाल राव ने कहा कि एआई युग में उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।
- इंसानी नियंत्रण और उत्पादकता: उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई का उपयोग विश्वविद्यालयों में केवल एक सेवक और सहायक के रूप में होना चाहिए, उसे मनुष्य पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एआई का उपयोग विद्यार्थियों की भाषा दक्षता, शोध क्षमता और व्यक्तिगत अध्ययन में उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।
- डिग्री से परे ‘लाइफलॉन्ग लर्निंग’: बदलती तकनीक के दौर में विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री बांटने तक सीमित रहने के बजाय जीवनभर सीखने (लाइफलॉन्ग लर्निंग) के अवसर उपलब्ध कराने होंगे।
- मूल्यांकन का तरीका बदले: प्रो. राव ने कहा कि शिक्षा में मूल्यांकन केवल अंतिम उत्तर जांचने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि छात्र के सोचने के तरीके, उसके तर्क, किए गए प्रयास और समस्या समाधान (प्रॉब्लम सॉल्विंग) की पूरी प्रक्रिया का मूल्यांकन होना चाहिए।
- रिसर्च का व्यावसायीकरण: विश्वविद्यालयों का शोध सिर्फ शोधपत्रों और पेटेंट तक सीमित न रहकर प्रोटोटाइप, व्यावसायिक उत्पाद और डीप-टेक स्टार्टअप में बदलना चाहिए। इसके लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों और उद्योग जगत के बीच सक्रिय साझेदारी अनिवार्य है।
मुफ्त सामग्री प्रसारण हो सकती है, कोचिंग दोतरफा संवाद जरूरी: प्रो. अमय करकरे
आईआईटी कानपुर के प्रो. अमय करकरे ने डिजिटल शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में एआई की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने ‘प्रोजेक्ट साथी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पहल दूरदराज और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों तक गुणवत्तापूर्ण तैयारी पहुंचाने में सक्षम साबित हो रही है।
- ड्रॉपआउट की चुनौती और व्यक्तिगत मार्गदर्शन: उन्होंने रेखांकित किया कि मुफ्त ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या सामग्री की कमी नहीं, बल्कि छात्रों द्वारा बीच में पढ़ाई छोड़ देना (ड्रॉपआउट) है। इसलिए समय पर फॉलोअप और व्यक्तिगत मार्गदर्शन जरूरी है।
- सुकराती शिक्षण पद्धति: प्रो. करकरे ने कहा कि एआई ट्यूटर को छात्रों को थाली में परोसकर समाधान देने के बजाय ‘सुकराती पद्धति’ अपनानी चाहिए। यानी विद्यार्थी को सीधे उत्तर न देकर ऐसे संकेत और मार्गदर्शन दिए जाएं, जिससे वह खुद अपनी गलतियों की पहचान कर सके और उन्हें सुधारना सीखे।
- दोतरफा संवाद: उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अध्ययन सामग्री मुफ्त में प्रसारित की जा सकती है, लेकिन प्रभावी कोचिंग केवल एकतरफा प्रसारण नहीं हो सकती; इसके लिए छात्र और शिक्षक के बीच निरंतर समीक्षा, फीडबैक और दोतरफा संवाद अनिवार्य है।
वैज्ञानिकों की भूमिका बदलेगा एआई, कृषि में डेटा एकीकरण जरूरी: डॉ. प्रसन्ना
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली के डॉ. बोड्डुपल्ली मारुति प्रसन्ना ने ‘एआई-संचालित फसल प्रजनन और कृषि आर्थिक प्रबंधन’ पर अपने विचार रखे।
- बदलती चुनौतियां: जलवायु परिवर्तन, घटते जल व पोषक तत्व, कीट-रोग और बढ़ती लागत के बीच फसल प्रजनन चक्र को छोटा करने के लिए एआई का इस्तेमाल जरूरी है।
- कृषि डेटा का एकीकरण: भारत में कृषि आंकड़े अलग-अलग संस्थानों में बिखरे पड़े हैं। डॉ. प्रसन्ना ने ‘राष्ट्रीय कृषि डेटा कॉमन्स’ और मानकीकृत बेंचमार्क डेटासेट स्थापित करने की मांग की, ताकि जीनोमिक डेटा, पर्यावरणीय आंकड़े और ड्रोन इमेजिंग को मिलाकर बेहतर फसल किस्में तैयार की जा सकें।
- वैज्ञानिक की नई भूमिका: उन्होंने कहा कि एआई कृषि वैज्ञानिकों की जगह कभी नहीं लेगा, बल्कि उनके काम का तरीका बदलेगा। वैज्ञानिक अब डेटा संग्राहक की जगह डेटा क्यूरेटर और भविष्यवक्ता की भूमिका निभाएंगे।
डेटा फैब्रिक से संवरेंगे टिकाऊ और स्मार्ट शहर: प्रो. सचिदानंद त्रिपाठी
आईआईटी कानपुर के प्रो. सचिदानंद त्रिपाठी ने ‘टिकाऊ शहरों के लिए एआई’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि शहरों में डेटा की प्रचुरता के बावजूद अलग-अलग विभागों के समन्वय न होने से उसका समुचित लाभ नहीं मिल पाता।
- इंटीग्रेटेड डिसीजन सपोर्ट: उन्होंने एकीकृत डेटा फैब्रिक और जिम्मेदार एआई के माध्यम से निर्णय समर्थन प्रणालियों (Decision Support Systems) को लागू करने की आवश्यकता बताई।
- जमीनी सफलता के उदाहरण:
- कानपुर: एआई आधारित वायु गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली से प्रदूषण के हॉटस्पॉट और उनके स्रोतों की समय रहते पहचान की जा रही है।
- दिल्ली: एआई आधारित मोबिलिटी सिस्टम से डीटीसी बस मार्गों का युक्तिकरण कर यात्रियों के समय की बचत की जा रही है।
- शहरी बाढ़ प्रबंधन: गांधीनगर, सूरत, राजकोट और कोझिकोड जैसे शहरों में सेंसर और एआई मॉडलिंग के जरिए बाढ़ के जोखिम और जलभराव की गहराई का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि टिकाऊ शहरों के निर्माण के लिए एआई प्रणालियों को केवल यह बताने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि ‘क्या हुआ’, बल्कि यह पूर्वानुमान लगाने में भी सक्षम होना चाहिए कि ‘आगे क्या हो सकता है’ ताकि नीतियां समय पर लागू की जा सकें।





