एडुटेक भारत | विशेष फीचर
कल्पना कीजिए…
आप भारत के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में से एक के विशाल परिसर में खड़े हैं। आसपास युवा विद्यार्थी हैं। कहीं कोई रोबोट पर काम कर रहा है, कहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर शोध चल रहा है और किसी प्रयोगशाला में वैज्ञानिक भविष्य की नई तकनीक तैयार कर रहे हैं।
लेकिन कुछ दशक पीछे जाएं तो यही जगह बिल्कुल अलग दिखाई देती थी।
यहां न इंजीनियरिंग की कक्षाएं थीं, न रिसर्च लैब और न ही टेक्नोलॉजी की दुनिया।
यहां ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने वाले भारतीयों को कैद किया जाता था।
यही जगह थी—Hijli Detention Camp।
और आज यही परिसर है IIT Kharagpur, भारत का पहला Indian Institute of Technology।
यही विरोधाभास IIT Kharagpur की कहानी को देश के दूसरे तकनीकी संस्थानों से अलग बनाता है।
एक ऐसी जगह, जहां कभी आजादी की आवाजों को बंद करने की कोशिश हुई, वही जगह आगे चलकर ज्ञान और तकनीकी स्वतंत्रता का केंद्र बन गई।
कहानी शुरू होती है 1930 से
1930 का दौर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। ब्रिटिश सरकार आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कर रही थी।

जेलों में जगह कम पड़ने लगी थी।
इसी दौर में बंगाल के Hijli में एक Detention Camp स्थापित किया गया।
यह कोई सामान्य जेल नहीं थी। यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐसे लोगों को रखा जाता था जिन्हें ब्रिटिश सरकार राजनीतिक रूप से खतरनाक मानती थी।
कई बंदियों को बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के हिरासत में रखा गया।
समय के साथ Hijli Detention Camp स्वतंत्रता आंदोलन के दमन का प्रतीक बन गया।
लेकिन 16 सितंबर 1931 को यहां जो हुआ, उसने इस जगह को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
16 सितंबर 1931: जब Hijli में चली गोलियां
उस दिन Hijli Detention Camp में बंद भारतीयों और ब्रिटिश प्रशासन के बीच तनाव बढ़ गया।
स्थिति अचानक बिगड़ी और ब्रिटिश पुलिस ने गोली चला दी।
इस गोलीबारी में दो निहत्थे बंदी—
संतोष कुमार मित्र और तारकेश्वर सेनगुप्ता
मारे गए।
यह घटना पूरे देश में आक्रोश का कारण बनी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
इन दोनों के शवों को लेने के लिए सुभाष चंद्र बोस स्वयं Hijli पहुंचे।
एक राजनीतिक बंदी की मौत अब केवल जेल के भीतर की घटना नहीं रह गई थी।
यह स्वतंत्रता आंदोलन के लिए ब्रिटिश दमन का एक और प्रतीक बन चुकी थी।
Hijli की घटना से टैगोर भी हुए विचलित
गोलीकांड की खबर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची।
रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने इस घटना पर चिंता और विरोध व्यक्त किया।
Hijli अब केवल एक detention camp नहीं था।
यह ब्रिटिश शासन और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बीच संघर्ष की कहानी का हिस्सा बन चुका था।
लेकिन इतिहास ने इस जगह के लिए कुछ और तय कर रखा था
Hijli Detention Camp 1937 में बंद हुआ।
कुछ वर्षों बाद, 1940 में इसे फिर खोला गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परिस्थितियां बदलीं और 1942 में Detention Camp को आखिरकार बंद कर दिया गया।
इसके बाद यह परिसर एक और ऐतिहासिक दौर से गुजरा।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहां अमेरिकी वायुसेना का इस्तेमाल भी हुआ।
एक ही परिसर ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, स्वतंत्रता आंदोलन और विश्व युद्ध—तीनों दौर देखे।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी कहानी अभी बाकी थी।
आजाद भारत ने जेल को चुना तकनीकी शिक्षा के लिए
1947 में भारत आजाद हुआ।
नए देश के सामने एक बहुत बड़ा सवाल था—
क्या भारत अपनी तकनीकी ताकत खुद विकसित कर सकता है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया तेजी से औद्योगिक और तकनीकी बदलाव की ओर बढ़ रही थी।
भारत को अपने इंजीनियर चाहिए थे।
अपने वैज्ञानिक चाहिए थे।
अपने शोधकर्ता चाहिए थे।
और ऐसे संस्थान चाहिए थे जो केवल डिग्री न दें, बल्कि नई तकनीक और नए विचार पैदा करें।
आजादी से पहले ही इस दिशा में सोच शुरू हो चुकी थी।
1946 में नलिनी रंजन सरकार समिति ने भारत में उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए ऐसे संस्थान स्थापित करने की सिफारिश की जो अमेरिका के MIT जैसे संस्थानों की तर्ज पर काम करें।
समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में उच्च तकनीकी संस्थान स्थापित करने की बात कही।
पूर्वी भारत के लिए स्थान चुना गया—Hijli।
जिस जगह कभी ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को कैद किया था, वही जगह स्वतंत्र भारत की तकनीकी शक्ति तैयार करने के लिए चुनी गई।
1950: Hijli में शुरू हुआ नया अध्याय
नए तकनीकी संस्थान ने पहले कलकत्ता के 5 Esplanade East से काम शुरू किया।
लेकिन जल्द ही इसे Hijli स्थानांतरित कर दिया गया।
पुरानी detention camp की इमारतें अब नई भूमिका के लिए तैयार होने लगीं।
जहां कभी कैदियों की निगरानी होती थी, वहां अब विद्यार्थियों की कक्षाएं लगने वाली थीं।
जहां कभी स्वतंत्रता सेनानियों के कदमों की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब इंजीनियरिंग और विज्ञान की चर्चा होने वाली थी।
18 अगस्त 1951: भारत के पहले IIT का जन्म
18 अगस्त 1951।

भारत के तकनीकी शिक्षा इतिहास की एक ऐतिहासिक तारीख।
तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने संस्थान का औपचारिक उद्घाटन किया।
नाम रखा गया—
Indian Institute of Technology.
यह था भारत का पहला IIT।
उस समय इसके पास आज की तरह हजारों विद्यार्थी और सैकड़ों अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं नहीं थीं।
पहले सत्र में—
224 विद्यार्थी
42 शिक्षक
10 विभाग
और सबसे खास बात—
कक्षाएं, प्रयोगशालाएं और प्रशासनिक कार्यालय पुराने Hijli Detention Camp की इमारतों में ही थे।
सोचिए…
एक ऐसी इमारत जहां कुछ वर्ष पहले स्वतंत्रता सेनानियों को बंदी बनाया जाता था, वहां अब भारत के भविष्य के इंजीनियर बैठकर विज्ञान और तकनीक पढ़ रहे थे।
यह केवल भवन का परिवर्तन नहीं था।
यह भारत के इतिहास का प्रतीकात्मक परिवर्तन था।
नेहरू और IIT का सपना
जवाहरलाल नेहरू मानते थे कि आधुनिक भारत के निर्माण में विज्ञान और तकनीक की बड़ी भूमिका होगी।
3 मार्च 1952 को नेहरू ने IIT Kharagpur की नई इमारत की आधारशिला रखी।
लेकिन उनकी सोच केवल Kharagpur तक सीमित नहीं थी।
वे चाहते थे कि भारत में ऐसे कई उच्चस्तरीय तकनीकी संस्थान हों जो दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों के बराबर खड़े हो सकें।
आगे चलकर इसी सोच से—
IIT Bombay
IIT Madras
IIT Kanpur
जैसे संस्थान अस्तित्व में आए।
फिर यह सिलसिला आगे बढ़ता गया।
आज IITs का नेटवर्क भारत की उच्च तकनीकी शिक्षा की सबसे मजबूत पहचान में शामिल है।
और इस कहानी का पहला अध्याय लिखा गया था—Kharagpur में।
1956: संसद ने बदल दिया संस्थान का दर्जा
IIT Kharagpur की यात्रा में 1956 एक और बड़ा मोड़ था।
संसद ने Indian Institute of Technology (Kharagpur) Act, 1956 पारित किया।
इसके साथ IIT Kharagpur को Institution of National Importance का दर्जा मिला।
अब यह केवल एक तकनीकी कॉलेज नहीं था।
यह राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बन चुका था।
एक ऐसा संस्थान जिसके ऊपर देश की तकनीकी क्षमता को मजबूत करने की जिम्मेदारी थी।
जेल की इमारत आज क्या याद दिलाती है?
समय बीतता गया।
IIT Kharagpur का परिसर बढ़ता गया।
नई प्रयोगशालाएं बनीं।
नई फैकल्टी आई।
नई तकनीकें आईं।
हजारों विद्यार्थी यहां पढ़ने लगे।
लेकिन पुरानी Hijli इमारतों का इतिहास मिटा नहीं।
आज भी यह परिसर IIT Kharagpur के इतिहास और भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की याद अपने भीतर समेटे हुए है।
पुरानी इमारत को Hijli Shaheed Bhavan के रूप में जाना जाता है।
कैंपस में Nehru Museum of Science and Technology भी है, जो विज्ञान और तकनीक की यात्रा को समझने का अवसर देता है।
इस तरह IIT Kharagpur में अतीत और भविष्य एक ही परिसर में दिखाई देते हैं।
एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियां।
दूसरी ओर आधुनिक विज्ञान और तकनीक।
224 विद्यार्थियों से वैश्विक पहचान तक
1951 में 224 विद्यार्थियों से शुरू हुआ संस्थान आज एक विशाल अकादमिक और शोध परिसर बन चुका है।
यहां इंजीनियरिंग के साथ विज्ञान, आर्किटेक्चर, मैनेजमेंट, कानून, मेडिकल टेक्नोलॉजी, डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऊर्जा और अनेक उभरते क्षेत्रों में शिक्षा और शोध हो रहा है।
इसके पूर्व छात्रों ने दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में पहचान बनाई।
इनमें Sundar Pichai, Google और Alphabet के CEO, Arjun Malhotra, HCL के सह-संस्थापक और कई अन्य प्रमुख वैज्ञानिक, उद्योगपति, प्रशासक और उद्यमी शामिल हैं।
लेकिन IIT Kharagpur की असली कहानी केवल इन नामों की सूची नहीं है।
इसकी असली कहानी उस संस्कृति की है जिसने विद्यार्थियों को सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समस्याओं को समझने और समाधान खोजने के लिए तैयार किया।
एक जेल से शुरू हुई कहानी ने भारत को क्या दिया?
Hijli से IIT Kharagpur की यात्रा को अगर केवल संस्थान का इतिहास मानें तो हम इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात खो देंगे।

इस कहानी में एक गहरा संदेश छिपा है।
ब्रिटिश शासन के लिए Hijli एक ऐसी जगह थी जहां लोगों की स्वतंत्रता सीमित की जाती थी।
स्वतंत्र भारत के लिए वही जगह ऐसी जगह बन गई जहां विचारों की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया गया।
पहले वहां सवाल पूछना खतरा था।
बाद में वहां सवाल पूछना शिक्षा का हिस्सा बन गया।
पहले वहां लोगों को बंद किया जाता था।
बाद में वहां ज्ञान को सीमाओं से मुक्त करने की कोशिश हुई।
यही वजह है कि IIT Kharagpur की कहानी भारत की शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में असाधारण महत्व रखती है।
75 साल बाद भी एक सवाल कायम है
IIT Kharagpur ने 18 अगस्त 2026 को अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं।
75 वर्षों में भारत की तकनीकी शिक्षा ने लंबी यात्रा तय की है।
लेकिन Hijli की पुरानी इमारत आज भी एक सवाल पूछती हुई दिखाई देती है—
अगर एक पुराना detention camp भारत के पहले IIT में बदल सकता है, तो शिक्षा और तकनीक भारत का भविष्य कितना बदल सकती है?
शायद IIT Kharagpur की 75वीं वर्षगांठ का सबसे बड़ा संदेश यही है।
भारत ने उस जगह को, जो कभी उसकी गुलामी की कहानी कहती थी, अपने तकनीकी आत्मविश्वास की कहानी में बदल दिया।
और यही कारण है कि IIT Kharagpur सिर्फ एक IIT नहीं है।
यह उस भारत की कहानी है जिसने जेल की दीवारों के बीच से निकलकर प्रयोगशालाओं तक का सफर तय किया।

Hijli से Kharagpur तक—यह केवल स्थान का परिवर्तन नहीं था।
यह भारत की सोच के बदलने की कहानी थी।






