News Desk : दुनिया स्वच्छ ऊर्जा के ऐसे विकल्प तलाश रही है जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर सकें। इस दिशा में Green Hydrogen को भविष्य के महत्वपूर्ण ईंधनों में गिना जा रहा है। अब IIT Bombay के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कम लागत वाला और अत्यधिक कुशल Catalyst विकसित किया है, जो पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
भारत में परमाणु ऊर्जा आधारित हाइड्रोजन उत्पादन की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास हो रहे हैं। तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित Indira Gandhi Centre for Atomic Research (IGCAR) में परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न ऊष्मा का इस्तेमाल कर हाइड्रोजन उत्पादन की तकनीक पर काम किया जा रहा है।
इसी व्यापक ऊर्जा परिवर्तन के बीच IIT Bombay का यह शोध Electrolysis के जरिए Green Hydrogen उत्पादन की लागत और दक्षता से जुड़ी चुनौती को संबोधित करता है।
पानी से हाइड्रोजन बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
हाइड्रोजन प्रकृति में स्वतंत्र रूप से बड़ी मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। इसे पानी जैसे स्रोतों से अलग करना पड़ता है। पानी के अणु को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने का सबसे सरल तरीका Electrolysis है।
इस प्रक्रिया में पानी के माध्यम से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है। इसके दौरान दो प्रमुख रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती हैं
Hydrogen Evolution Reaction (HER): Cathode पर हाइड्रोजन गैस बनती है।
Oxygen Evolution Reaction (OER): Anode पर ऑक्सीजन गैस बनती है।
लेकिन इन प्रतिक्रियाओं को शुरू करने के लिए काफी ऊर्जा की जरूरत होती है। यही वह जगह है जहां Catalyst महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Catalyst रासायनिक प्रतिक्रिया की ऊर्जा बाधा को कम करके प्रक्रिया को तेज करते हैं, जबकि स्वयं स्थायी रूप से खर्च नहीं होते।
Platinum और Iridium का विकल्प तलाश रहे वैज्ञानिक
वर्तमान में HER और OER के लिए Platinum, Ruthenium और Iridium जैसे महंगे धातु आधारित Catalyst बेहद प्रभावी माने जाते हैं। लेकिन इनकी उपलब्धता सीमित है और इनकी कीमत बहुत अधिक है। लंबे समय तक कठोर परिस्थितियों में काम करने पर इनके प्रदर्शन में गिरावट भी आ सकती है।
इसी चुनौती को देखते हुए IIT Bombay की टीम ने ऐसी सामग्री विकसित करने का लक्ष्य रखा जो—सस्ती हो, आसानी से उपलब्ध तत्वों से बने, टिकाऊ हो और पानी को हाइड्रोजन व ऑक्सीजन में विभाजित करने की दोनों प्रतिक्रियाओं को प्रभावी ढंग से कर सके।
IIT Bombay की शोधकर्ता Dr Savi Chaudhary, जो इस शोध-पत्र की प्रथम लेखिका हैं, के अनुसार शोध का प्रमुख उद्देश्य एक कुशल और टिकाऊ, Earth-abundant Catalyst विकसित करना था।
Cobalt, Nickel, Phosphate और Graphite का अनोखा मिश्रण
शोधकर्ताओं ने नए Catalyst को तैयार करने के लिए Molecular Precursor Engineering तकनीक का इस्तेमाल किया।इसमें वैज्ञानिक पहले ऐसे विशिष्ट Molecular Precursors तैयार करते हैं, जो आगे चलकर जटिल और उपयोगी सामग्री का निर्माण करते हैं।
टीम ने सबसे पहले Cobalt और Nickel Phosphate के अलग-अलग Metal Complexes तैयार किए। इसके बाद इन्हें Exfoliated Graphite यानी बेहद पतली Carbon Layers के साथ मिलाया गया।
मिश्रण को अपेक्षाकृत कम तापमान पर गर्म करने के बाद एक ऐसी सामग्री तैयार हुई जिसमें Cobalt-Nickel Phosphate की एक Amorphous Layer conductive Graphite Sheets पर समान रूप से फैल गई।
यही संयोजन आगे चलकर एक Bifunctional Catalyst बना, जो Hydrogen Evolution Reaction और Oxygen Evolution Reaction—दोनों में काम कर सकता है।

Amorphous Structure ने बढ़ाई Catalyst की क्षमता
इस शोध की खास बात Catalyst की Amorphous Structure भी है।आमतौर पर किसी crystalline material में परमाणु एक व्यवस्थित संरचना में होते हैं। इसके विपरीत amorphous material में परमाणुओं की व्यवस्था अधिक अव्यवस्थित होती है।
IIT Bombay के वैज्ञानिकों के अनुसार इस अव्यवस्थित संरचना ने Catalyst को अधिक सक्रिय बनाने में मदद की। इससे अधिक सक्रिय स्थान उपलब्ध हुए, जहां HER और OER जैसी प्रतिक्रियाएं प्रभावी रूप से हो सकती हैं।
Prof Ramaswamy Murugavel, IIT Bombay में Professor और अध्ययन के Corresponding Author, के अनुसार Cobalt और Nickel का संयोजन दोनों प्रतिक्रियाओं के लिए bifunctional activity प्रदान करता है, जबकि Graphite का conductive support charge transport को बेहतर बनाता है।
72 घंटे तक लगातार चला Catalyst
नए Catalyst की durability की जांच के दौरान इसे 72 घंटे तक लगातार संचालित किया गया और इस दौरान इसके प्रदर्शन में लगभग कोई गिरावट नहीं देखी गई।हालांकि शोधकर्ताओं ने पाया कि Oxygen Evolution Reaction के दौरान Catalyst की सतह में structural transformation हुआ। इस प्रक्रिया में कुछ phosphate सतह से हटकर oxygen-rich metal compounds में परिवर्तित हुआ।
दिलचस्प बात यह रही कि यह बदलाव Catalyst के लिए नुकसानदायक साबित नहीं हुआ। इसके बजाय surface reconstruction ने Catalyst की activity को बनाए रखने में मदद की।वैज्ञानिकों के अनुसार catalytic conditions में phosphate-based Catalyst की सतह अधिक सक्रिय Oxyhydroxide Species में पुनर्गठित हो सकती है, जबकि अंदर मौजूद phosphate framework Catalyst की chemical stability और structural integrity बनाए रखने में मदद करता है।

Green Hydrogen के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
Green Hydrogen को स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण विकल्प माना जाता है, क्योंकि इसके इस्तेमाल से Carbon emissions को कम करने की संभावना है। लेकिन Green Hydrogen की व्यापक commercial production के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—उत्पादन की लागत और Electrolysis की ऊर्जा दक्षता। यदि महंगे Platinum, Ruthenium और Iridium जैसे Noble Metals की जगह Cobalt और Nickel जैसे अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध तत्वों से बने प्रभावी Catalyst इस्तेमाल किए जा सकें, तो Electrolyser की लागत को कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
IIT Bombay का यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक नए Catalyst की खोज तक सीमित नहीं है। Molecular Precursor Engineering भविष्य में अलग-अलग composition और properties वाली advanced materials को अधिक नियंत्रित तरीके से विकसित करने का रास्ता भी खोल सकती है।
भारत के Clean Energy Mission के लिए संभावित महत्व
भारत में Hydrogen Economy विकसित करने के लिए Electrolysis, Renewable Energy और Nuclear Energy—तीनों क्षेत्रों में तकनीकी विकास पर जोर दिया जा रहा है।ऐसे में IIT Bombay का यह Catalyst भविष्य में—कम लागत वाले Electrolysers के विकास,Green Hydrogen उत्पादन की दक्षता बढ़ाने,महंगे Noble Metals पर निर्भरता घटाने,Hydrogen-based transport और industry को बढ़ावा देने,तथा Clean Energy Technologies के विकासमें उपयोगी साबित हो सकता है।हालांकि प्रयोगशाला स्तर के प्रदर्शन को बड़े औद्योगिक स्तर पर दोहराने के लिए अभी आगे के परीक्षण, scale-up और long-term durability studies की आवश्यकता होगी।
IIT Bombay के शोधकर्ताओं का मानना है कि Molecular Precursor Engineering advanced Electrocatalysts को डिजाइन करने के लिए एक शक्तिशाली और versatile approach साबित हो सकती है।पानी से स्वच्छ हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया को सस्ता और अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में यह शोध भारत की उभरती Hydrogen Economy के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम माना जा सकता है।






