ऑस्टियोआर्थराइटिस का इलाज खोजने की राह पर IIT Kanpur की शोधार्थी सप्तोमी चक्रवर्ती
यानी गठिया जैसी गंभीर बीमारी अपना असर दिखाने लगती है। हड्डियों के बीच
मौजूद कार्टिलेज का कुशन ही हड्डियों को आपस में घर्षण से बचाते हुए सहज
गति बनाए रखने में मदद करता है।
में तंत्रिका तंतु नहीं होते। इसलिए शुरुआती नुकसान का पता आसानी से नहीं
चलता। जब दर्द महसूस होना शुरू होता है, तब तक कई मामलों में बीमारी काफी
आगे बढ़ चुकी होती है और हड्डियां एक-दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं।
में होने वाला दर्द उम्र बढ़ने के साथ आम समस्या बनता जा रहा है। मौजूदा
उपचार मुख्य रूप से दर्द और लक्षणों को नियंत्रित करने पर केंद्रित हैं,
जबकि गंभीर स्थिति में घुटना प्रत्यारोपण तक की जरूरत पड़ सकती है।इस
समस्या के निदान के लिए वर्तमान में जो उपचार है उसमें दर्द निवारक दवाएं,
सप्लीमेंट और गंभीर मामलों में घुटना प्रत्यारोपण जैसे विकल्प शामिल हैं।
हालांकि प्रत्यारोपण की भी अपनी सीमाएं हैं और समय के साथ कृत्रिम जोड़ में समस्या आ सकती है। ऐसे में आइआइटी के मेहता फैमिली सेंटर फॉर इंजीनियरिंग इन मेडिसिन की PhD शोधार्थी सप्तोमी चक्रवर्ती कुछ ठोस करने जा रही हैं। उन्होंने इस बीमारी के शुरुआती चरण
में पहचान और उपचार की नई राह तलाशते हुए ऐसी कार्टिलेज-बाइंडिंग ड्रग
डिलीवरी प्रणाली पर काम किया है, जो कार्टिलेज से जुड़कर दवा को धीरे-धीरे रिलीज करने में मदद कर सकती है।

ऑस्टियोआर्थराइटिस यानी गठिया के कारण
सप्तोमी प्रोफेसर धीरेंद्र एस. कट्टी के मार्गदर्शन में ऑस्टियोआर्थराइटिस और इसके रोग-परिवर्तनकारी उपचारों पर शोध कर रही हैं। उनका शोध शुरुआती चरण के ऑस्टियोआर्थराइटिस मॉडल, नए उपचार लक्ष्य, बहु-लक्षित दवा उम्मीदवार और ऐसी दवा पहुंचाने की प्रणाली पर केंद्रित है, जो दवा को लंबे समय तक प्रभावित जोड़ में बनाए रख सके।
मां से मिली जीव विज्ञान को समझने की प्रेरणापश्चिम बंगाल में पली-बढ़ीं सप्तोमी के लिए जीव विज्ञान केवल किताब का विषय नहीं था। उनकी मां एक कैंसर संस्थान में नर्स थीं और घर लौटकर मरीजों से जुड़े अनुभव साझा करती थीं। इन्हीं अनुभवों ने सप्तोमी को बीमारी और मानव जीवन के बीच के संबंध को करीब से समझने का अवसर दिया। उनके
माता-पिता ने बंगाली माध्यम से पढ़ाई की थी, लेकिन उन्होंने बेटी को बेहतर
अवसर देने के लिए मिशनरी स्कूल में पढ़ाया और उसे अपनी रुचि के अनुसार
क्षेत्र चुनने की स्वतंत्रता दी।
सप्तोमी खुद को स्कूल के दिनों में असाधारण छात्रा नहीं मानती थीं। वह खुद को ‘मीडियोकर’ बताती हैं और कहती हैं कि कई बार उन्हें लगता था कि आसपास के दूसरे विद्यार्थी उनसे कहीं अधिक प्रतिभाशाली हैं। शोध की शुरुआत ने बदली दिशासप्तोमी ने बेंगलुरु से बीटेक किया और इसके बाद KIIT से बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर डिग्री की। एक प्रोफेसर के प्रोत्साहन ने
उन्हें शोध को गंभीरता से लेने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद उन्होंने
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपने मास्टर प्रोजेक्ट के दौरान प्रोफेसर
सुभाष चंद्र के मार्गदर्शन में कैंसर से जुड़े जीन इंटरैक्शन पर काम किया।यही
वर्ष उनके लिए निर्णायक साबित हुआ। उन्हें समझ आया कि शोध केवल प्रयोगशाला
में प्रयोग करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मानव जीवन और
बीमारी के बेहतर उपचार से है।
GATE क्वालिफाई करने के बाद जब IIT Kanpur में ऑस्टियोआर्थराइटिस पर काम करने वाली प्रयोगशाला में प्रवेश का अवसर मिला तो उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया। मास्टर डिग्री के दौरान खुद जोड़ों में दर्द का अनुभव होने के कारण उन्होंने अपने स्टेटमेंट ऑफ पर्पज में भी ऑस्टियोआर्थराइटिस को ही शोध का विषय बनाया था।
हड्डियों के बीच का ‘कुशन’ खत्म होने से बढ़ती है समस्या
ऑस्टियोआर्थराइटिस में हड्डियों के बीच मौजूद कार्टिलेज धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होता है। यह कार्टिलेज जोड़ में कुशन की तरह काम करता है और हड्डियों को आपस में घर्षण से बचाते हुए सहज गति में मदद करता है।समस्या
यह है कि कार्टिलेज में तंत्रिका तंतु नहीं होते। इसलिए शुरुआती नुकसान का
पता आसानी से नहीं चलता। जब दर्द महसूस होना शुरू होता है, तब तक कई
मामलों में बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है और हड्डियां एक-दूसरे से रगड़ खाने लगती हैं।वर्तमान
में उपचार में दर्द निवारक दवाएं, सप्लीमेंट और गंभीर मामलों में घुटना
प्रत्यारोपण जैसे विकल्प शामिल हैं।
हालांकि प्रत्यारोपण की भी अपनी सीमाएं
हैं और समय के साथ कृत्रिम जोड़ में समस्या आ सकती है।चार दिशाओं में शोधसप्तोमी का PhD शोध चार आपस में जुड़े उद्देश्यों पर आधारित है। पहला, उन्होंने शुरुआती चरण के ऑस्टियोआर्थराइटिस
का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो मानव बीमारी की वास्तविक स्थिति को बेहतर
ढंग से समझने में मदद कर सके। बेहतर प्री-क्लिनिकल मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण
है क्योंकि कई दवा उम्मीदवार प्रयोगशाला स्तर पर सफल होने के बावजूद मरीजों
में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते।
दूसरे चरण में उन्होंने बीमारी के नए लक्ष्यों की तलाश की। ऑस्टियोआर्थराइटिस कई कारकों से प्रभावित होने वाली बीमारी है, इसलिए केवल एक लक्ष्य को ध्यान में रखकर उपचार करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
तीसरे चरण में उन्होंने ऐसे दवा उम्मीदवारों पर काम किया, जो बीमारी के एक से अधिक प्रमुख कारकों पर एक साथ असर डाल सकें।चौथा और महत्वपूर्ण क्षेत्र दवा पहुंचाने की प्रणाली है। जोड़ लगातार गति में रहते हैं, इसलिए इंजेक्शन के जरिए दी गई दवा प्रभावित स्थान से जल्दी बाहर निकल सकती है। सप्तोमी ने ऐसी कार्टिलेज-बाइंडिंग ड्रग डिलीवरी प्रणाली पर काम किया है, जो कार्टिलेज से जुड़कर दवा को धीरे-धीरे रिलीज करने में मदद कर सकती है।
इस शोध को Anusandhan National Research Foundation (ANRF) से मंजूरी मिली और इसके लिए पेटेंट भी प्रदान किया गया है।कोविड के बाद प्रयोगशाला में लंबी चुनौतीसप्तोमी ने 2019 में IIT Kanpur
ज्वाइन किया। इसके कुछ ही समय बाद कोविड-19 महामारी के कारण कैंपस और
प्रयोगशाला का काम प्रभावित हुआ और करीब एक वर्ष का समय शोध कार्य में
बाधित हुआ।प्रयोग दोबारा शुरू होने के बाद भी मुश्किलें कम नहीं
हुईं। करीब एक वर्ष तक उन्हें अपने प्रयोगों में सकारात्मक परिणाम नहीं
मिला। कभी उपकरणों में खराबी आई तो कभी शोध की डिजाइन अपेक्षित परिणाम नहीं
दे सकी। महीनों तक समस्या का समाधान खोजने में निकल गए।
ऐसे दौर में उनके एक वरिष्ठ लैबमेट, जो ऑस्टियोआर्थराइटिस पर काम कर चुके थे, ने उन्हें लगातार मार्गदर्शन दिया। वहीं हॉस्टल की एक मित्र उनके लिए भावनात्मक सहारा बनीं। सप्तोमी के अनुसार, इन लोगों ने उन्हें कठिन दौर से निकलने और अगले दिन फिर से काम शुरू करने की ताकत दी।
पुरस्कारों और पेटेंट ने बढ़ाया आत्मविश्वास
लंबे संघर्ष के बाद शोध के परिणाम सामने आने लगे। ड्रग डिलीवरी प्रोजेक्ट को ANRF की मंजूरी मिली और पेटेंट प्रदान किया गया। उन्हें अपने सहयोगी शोध कार्य के माध्यम से पहली फर्स्ट-ऑथर पब्लिकेशन भी मिली। BHU में किए गए शोध और IIT Kanpur में शुरुआती अकादमिक कार्य से भी उनके शोध प्रकाशन और पुस्तक अध्याय जुड़े हैं।
उन्होंने IIT Delhi और SCTIMST, केरल में आयोजित सम्मेलनों में शोध प्रस्तुत किया और दोनों
स्थानों पर सर्वश्रेष्ठ पोस्टर पुरस्कार हासिल किए। दक्षिण कोरिया के इंचियोन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ऑस्टियोआर्थराइटिस सम्मेलन में भी उन्होंने अपना शोध प्रस्तुत किया।मेहता फैमिली सेंटर के फाउंडेशन डे पर उन्हें 10 मिनट का औपचारिक व्याख्यान देने का अवसर मिला, जो IIT Kanpur में उनका पहला औपचारिक टॉक था।
PhD के अंतिम पड़ाव पर सप्तोमी
MFF समर्थित शोध पारिस्थितिकी तंत्र में साझा और केंद्रीय प्रयोगशाला सुविधाओं को सप्तोमी
महत्वपूर्ण मानती हैं। उनका मानना है कि अलग-अलग लैब के शोधार्थियों को
उपकरण और सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होना शोध की गति बढ़ाने में मदद करता
है।
सप्तोमी अब अपना ओपन सेमिनार पूरा कर चुकी हैं और PhD
की अंतिम प्रक्रिया के करीब हैं। जिस शोध यात्रा को एक समय उन्होंने बेहद
कठिन पाया था, आज वही उनके लिए बदलाव और सीख का माध्यम बन चुकी है। उनका
काम इस उम्मीद पर आधारित है कि ऑस्टियोआर्थराइटिस
का इलाज केवल दर्द को दबाने तक सीमित न रहे, बल्कि बीमारी के शुरुआती चरण
में उसके कारणों और प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की दिशा में आगे बढ़े।
