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IIT Bombay के प्रो. महेश तिरुमकुडुलु की टीम ने खून की बूंद के फैलाव से एनीमिया और सिकल सेल रोग की स्क्रीनिंग के लिए कम लागत वाली तकनीक विकसित की।

मुंबई | Edutechbharat.com विशेष रिपोर्ट

क्या खून की एक छोटी-सी बूंद से एनीमिया और सिकल सेल रोग की पहचान के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं? भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी कम लागत वाली तकनीक विकसित की है, जिसमें कांच की स्लाइड पर खून की बूंद कितनी दूर तक फैलती है, इसका इस्तेमाल बीमारी की स्क्रीनिंग के लिए किया जाता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें महंगी और जटिल प्रयोगशाला व्यवस्था पर निर्भरता कम करने की संभावना है।

IIT Bombay के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की शोध टीम ने यह तकनीक विकसित की है। टीम का नेतृत्व प्रोफेसर महेश तिरुमकुडुलु (Prof. Mahesh Tirumkudulu) ने किया है।

खून के फैलने की दूरी से कैसे मिलेगी बीमारी की जानकारी?

इस तकनीक का आधार खून के बहने और फैलने का भौतिक गुण है। आम तौर पर खून की एक बूंद कांच की सतह पर किस तरह फैलेगी, यह उसकी चिपचिपाहट यानी Blood Viscosity और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

शोधकर्ताओं ने एक स्वचालित उपकरण तैयार किया है, जो नियंत्रित परिस्थितियों में खून की बूंद को कांच की स्लाइड पर फैलाकर एक समान ब्लड स्मीयर (Blood Smear) बनाता है। इसके बाद स्मीयर की लंबाई मापी जाती है।

शोध टीम के अनुसार, अलग-अलग लोगों के रक्त के फैलाव में अंतर पाया गया। अधिक चिपचिपा रक्त समान परिस्थितियों में कम फैलता है, जिससे अपेक्षाकृत छोटा और मोटा स्मीयर बन सकता है। इन अंतरों का विश्लेषण करके एनीमिया और सिकल सेल रोग की स्क्रीनिंग में उपयोगी संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।

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एनीमिया और सिकल सेल रोग की पहचान में कैसे उपयोगी है तकनीक?

1. एनीमिया की स्क्रीनिंग: एनीमिया में रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो सकता है और लाल रक्त कोशिकाओं की सांद्रता भी प्रभावित हो सकती है। ये बदलाव रक्त के प्रवाह और फैलाव के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने इसी संबंध का उपयोग स्क्रीनिंग के लिए किया है।

2. सिकल सेल रोग की पहचान और उपचार की निगरानी: सिकल सेल रोग में लाल रक्त कोशिकाएं अपना सामान्य आकार खोकर हंसिया जैसी आकृति ग्रहण कर सकती हैं। इससे उनकी लचक और रक्त के प्रवाह पर असर पड़ता है। शोधकर्ताओं की तकनीक इन बदलावों से जुड़े संकेत पहचानने के साथ उपचार की निगरानी में भी उपयोगी हो सकती है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि रक्त के फैलाव की लंबाई अकेले किसी बीमारी की निश्चित पुष्टि नहीं करती। स्क्रीनिंग के नतीजों की चिकित्सकीय जांच और आवश्यकतानुसार अन्य परीक्षणों से पुष्टि करनी पड़ सकती है।

महंगी लैब के बिना जांच की संभावना

इस तकनीक को विकसित करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में जांच की सुविधा पहुंचाना है, जहां आधुनिक डायग्नोस्टिक लैब तक पहुंचना मुश्किल है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, परीक्षण में पिपेट, कांच की स्लाइड, एक कम लागत वाला रसायन, सिकलिंग प्रक्रिया के लिए वायल और स्मीयर की लंबाई मापने के लिए स्केल या इमेजिंग उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है।

टीम ने स्मीयर बनाने की प्रक्रिया को एकसमान रखने के लिए स्वचालित उपकरण भी विकसित किया है। इसका उद्देश्य जांच के दौरान मानवीय भिन्नता कम करना और प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

यदि तकनीक का नियामकीय सत्यापन और व्यावहारिक उपयोग सफल रहता है, तो यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, दूरदराज के इलाकों और सीमित संसाधनों वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में स्क्रीनिंग के नए विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकती है।

आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य जांच के लिए क्यों अहम है यह शोध?

भारत में एनीमिया एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। वहीं, सिकल सेल रोग की रोकथाम, समय पर पहचान और उपचार की निगरानी विशेष रूप से प्रभावित समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में कम लागत वाली और अपेक्षाकृत सरल स्क्रीनिंग तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में योगदान दे सकती है।

हालांकि, इस तकनीक की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह अलग-अलग आबादी में कितनी सटीक है, गलत सकारात्मक और गलत नकारात्मक परिणाम कितने आते हैं तथा इसका प्रदर्शन वास्तविक स्वास्थ्य केंद्रों में कैसा रहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रक्त की चिपचिपाहट और उसके फैलाव के संबंध पर आनुवंशिक भिन्नताओं का भी असर पड़ सकता है। कुछ दुर्लभ स्थितियों, जैसे हाइपरविस्कोसिटी सिंड्रोम, में एनीमिया की स्क्रीनिंग अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती। इसलिए इसे हर परिस्थिति में भरोसेमंद मानना उचित नहीं होगा।

ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के लिए वरदान

इस अध्ययन की मुख्य लेखिका और पीएचडी शोधार्थी डॉ. महरुख मीर के अनुसार इस जांच के लिए किसी आधुनिक पैथोलॉजी लैब या विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए केवल स्लाइड, पिपेट, एक सस्ता केमिकल और स्मीयर की लंबाई नापने के लिए साधारण रूलर या इमेजिंग उपकरण की जरूरत होती है। इसलिए यह तकनीक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और दूरदराज के आदिवासी इलाकों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी।

IIT Bombay स्टार्टअप को मिली तकनीक, नियामकीय मंजूरी की दिशा में काम

इस तकनीक को IIT Bombay से जुड़े स्टार्टअप Rheoheme Private Limited को लाइसेंस दिया गया है। ETHealthworld की रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ता मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित National Institute for Research in Tribal Health और AIIMS Nagpur के साथ मिलकर नियामकीय मंजूरी की दिशा में काम कर रहे हैं।

टीम भविष्य में इस उपकरण की मदद से रक्त के थक्के बनने में लगने वाले समय (Clotting Time) और ग्लूकोज स्तर मापने की संभावनाओं पर भी विचार कर रही है।

निष्कर्ष: साधारण भौतिक सिद्धांत से स्वास्थ्य तकनीक तक

IIT Bombay का यह शोध दिखाता है कि किसी जटिल स्वास्थ्य समस्या के समाधान के लिए हमेशा महंगे उपकरण ही जरूरी नहीं होते। कभी-कभी खून जैसे जैविक द्रव के साधारण भौतिक व्यवहार को समझकर भी उपयोगी तकनीक विकसित की जा सकती है।

यदि यह तकनीक आवश्यक परीक्षणों और नियामकीय प्रक्रिया में सफल होती है, तो भविष्य में एनीमिया और सिकल सेल रोग की शुरुआती स्क्रीनिंग को अधिक सुलभ बनाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल इसे एक संभावनाशील तकनीकी विकास के रूप में देखना चाहिए, न कि स्थापित चिकित्सकीय जांच के विकल्प के रूप में।