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1961 में साझा प्रवेश परीक्षा की शुरुआत से बदली दाखिले की तस्वीर, IIT बॉम्बे के पहले बैच के पूर्व छात्र जुगल टंडन का बयान फिर चर्चा में | जानिए कैसे स्कूल के अंकों और इंटरव्यू से शुरू हुआ IIT में प्रवेश का सफर

नई दिल्ली (Edutechbharat.com)। आज आईआईटी में दाखिला लेना लाखों विद्यार्थियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। स्कूल की पढ़ाई के साथ कोचिंग, मॉक टेस्ट, हजारों सवालों का अभ्यास और जेईई में बेहतर रैंक हासिल करने की जद्दोजहद। लेकिन जरा उस दौर की कल्पना कीजिए, जब आईआईटी में दाखिले के लिए न आज जैसी कोचिंग इंडस्ट्री थी और न ही कंप्यूटर आधारित परीक्षा का दबाव। उस समय विद्यार्थियों की शैक्षणिक योग्यता, स्कूल के अंक और साक्षात्कार चयन में अहम भूमिका निभाते थे। वक्त के साथ प्रवेश प्रक्रिया इतनी बदल गई कि आईआईटी बॉम्बे के पहले बैच के पूर्व छात्र जुगल टंडन का बयान भी चर्चा में आया—“अगर मुझे आज जेईई देना पड़े, तो शायद मैं इसे पास नहीं कर पाऊंगा।”

पहले बैच के छात्र का बयान, आज की परीक्षा पर बड़ा सवाल

आईआईटी बॉम्बे के पहले बैच से जुड़े जुगल टंडन का यह बयान मौजूदा प्रवेश परीक्षा की कठिनाई और बदलती प्रतिस्पर्धा को समझने का एक दिलचस्प नजरिया पेश करता है। 25 दिसंबर 2023 को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में टंडन के हवाले से यह टिप्पणी की गई थी। आईआईटी से स्नातक होने के बाद उन्होंने एमएएमसी दुर्गापुर, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड और कर्नाटक की जिंदल विजयनगर स्टील लिमिटेड जैसी कंपनियों में काम किया।

उनका बयान इस बात की ओर भी ध्यान खींचता है कि आज के विद्यार्थियों की चुनौती केवल विषयों की समझ तक सीमित नहीं है। उन्हें कम समय में कठिन सवाल हल करने, तेज गति से सही उत्तर चुनने और देशभर के प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के बीच अपनी जगह बनाने की तैयारी करनी पड़ती है।IIT Bombay के वैज्ञानिकों ने बनाया सस्ता और टिकाऊ Catalyst, Green Hydrogen उत्पादन को मिलेगी नई रफ्तार

जब स्कूल के अंक और इंटरव्यू तय करते थे भविष्य

1951 में IIT खड़गपुर से शुरू हुआ सफर

देश के पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर की स्थापना 1951 में हुई। शुरुआती वर्षों में दाखिले के लिए आज जैसी एक साझा राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा नहीं थी। विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड और साक्षात्कार के आधार पर चयन किया जाता था। उम्मीदवारों की योग्यता परखने के लिए प्रोफेसरों के पैनल अलग-अलग शहरों में भी जाते थे।

आवेदकों की संख्या बढ़ने के साथ चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा की भूमिका बढ़ी। आईआईटी खड़गपुर ने 1950 के दशक के उत्तरार्ध में अपनी प्रवेश परीक्षा आयोजित करनी शुरू की, लेकिन उस समय सभी आईआईटी के लिए एक समान परीक्षा की व्यवस्था नहीं थी।

1961 में बदली दाखिले की पूरी व्यवस्था

चार संस्थानों के लिए साझा परीक्षा की शुरुआत

आईआईटी बॉम्बे की स्थापना 1958 में हुई, जबकि आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर 1959 में अस्तित्व में आए। शुरुआती वर्षों में संस्थानों की चयन प्रक्रिया अलग-अलग थी। वर्ष 1961 में साझा प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था शुरू होने के बाद चयन प्रक्रिया को एकरूप बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया। आगे चलकर यही व्यवस्था ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (JEE) के रूप में विकसित हुई।

शुरुआती परीक्षा का स्वरूप भी आज से अलग था। भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित के अलावा अंग्रेजी, सामान्य ज्ञान और इंजीनियरिंग ड्राइंग जैसे विषय भी परीक्षा में शामिल रहे। बाद के वर्षों में परीक्षा के पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव होते गए।समुद्र से भविष्य तक: भारत में Ocean Engineering का बढ़ता महत्व और IIT Bombay–DGMA समझौते का दूरगामी असर, देश के 6 बड़े संस्थान जहां होती है पढ़ाई

सीमित सीटों से लाखों सपनों तक पहुंची दौड़

आज जेईई की प्रतिस्पर्धा का पैमाना पहले की तुलना में बहुत बड़ा हो चुका है। आईआईटी की सीटें बढ़ी हैं, लेकिन इन संस्थानों में प्रवेश पाने की आकांक्षा भी तेजी से बढ़ी है। अब विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की जानकारी नहीं, बल्कि समय प्रबंधन, सवालों की कठिनाई को समझने और दबाव में सटीक प्रदर्शन करने की क्षमता भी विकसित करनी पड़ती है।

जुगल टंडन का बयान इसी बदलाव को रेखांकित करता है। यह कहना नहीं है कि पुराने दौर के विद्यार्थी कम प्रतिभाशाली थे या आज के विद्यार्थी अधिक सक्षम हैं। बल्कि दोनों दौर की परिस्थितियां, परीक्षा की प्रकृति और प्रतिस्पर्धा का स्तर अलग-अलग रहा है।IIT Bombay

आईआईटी में दाखिले का इतिहास बताता है कि चयन प्रक्रिया समय के साथ केवल कठिन नहीं हुई, बल्कि बड़े पैमाने पर निष्पक्ष और एकरूप चयन की जरूरत के अनुसार बदली भी है। कभी व्यक्तिगत साक्षात्कार से शुरू हुआ यह सफर आज देश की सबसे प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं में शामिल हो चुका है।