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कानपुर : देश में आरक्षण नीति को लेकर चल रहे विवाद और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के बीच छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (CSJM यूनिवर्सिटी) के परिसर में भी वैचारिक बहस तेज हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सामान्य वर्ग द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग और दूसरी तरफ सरकारी नौकरियों में घटते पदों को लेकर आरक्षित वर्ग की चिंताओं के बीच विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने अपनी स्पष्ट और बेबाक राय रखी है।

कैंपस में छात्रों के बीच यह बहस मुख्य रूप से दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है—एक पक्ष जहां सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व को जरूरी मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष आर्थिक असमानता और अवसरों की कमी को प्रमुख मुद्दा बता रहा है।

CSJM यूनिवर्सिटी के छात्रों की राय: दो अलग-अलग दृष्टिकोण

1. प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के पक्षधर:

  • रितिका (बीजेएमसी छात्रा): “आरक्षण को सिर्फ आर्थिक मदद के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसका मूल उद्देश्य सदियों से पिछड़े वर्गों को समाज में बराबरी और प्रतिनिधित्व (Representation) दिलाना है। आज भी आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद कई लोगों को सामाजिक भेदभाव झेलना पड़ता है। जब तक उच्च शिक्षण संस्थानों और सरकारी विभागों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक जाति-आधारित आरक्षण का बने रहना अनिवार्य है।”
  • प्रतीक (बी.ए. तृतीय वर्ष के छात्र): “आरक्षण कोई ‘गरीबी हटाओ योजना’ नहीं है। इसका असली मकसद शोषित और वंचित वर्गों को सत्ता, शासन और उच्च पदों पर भागीदारी देना है। आज भी न्यायपालिका और बड़े संस्थानों में दलित और पिछड़े वर्ग की मौजूदगी बेहद कम है। पैसे कमाने से सामाजिक भेदभाव खत्म नहीं होता। जाति-आधारित आरक्षण को हटाना सामाजिक न्याय के ताने-बाने के लिए नुकसानदेह साबित होगा।”

2. आर्थिक आधार और समान अवसर के समर्थक:

  • देव (बी.टेक तृतीय वर्ष के छात्र): “जमीनी हकीकत यह है कि आज जातिगत आरक्षण पूरी तरह प्रासंगिक नहीं रहा। आरक्षित वर्ग के कई परिवार आर्थिक रूप से बेहद संपन्न हो चुके हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ ले रहे हैं। इसके विपरीत, सामान्य वर्ग (General Category) के कई ऐसे छात्र हैं जिनके माता-पिता कॉलेज की फीस तक नहीं भर पाते। गरीबी का कोई धर्म या जाति नहीं होती; आरक्षण का एकमात्र पैमाना ‘पारिवारिक वार्षिक आय’ होना चाहिए।”
  • पलक (बीजेएमसी छात्रा): “देश में अब जातिगत आरक्षण को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। इसका आधार केवल और केवल परिवार की आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। सामान्य वर्ग में भी कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाते। वास्तविक जरूरतमंद को अवसर तभी मिलेगा जब आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पर तय होगा।”

देशव्यापी विमर्श और प्रशासनिक आंकड़ों की पृष्ठभूमि

CSJMU परिसर में उठ रही यह आवाजें देश में चल रहे व्यापक विमर्श का ही हिस्सा हैं:

  • सामान्य वर्ग का आंदोलन: दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘आरक्षण सुधार आंदोलन’ के तहत सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकारों के लिए ‘राष्ट्रीय सामान्य वर्ग आयोग’ के गठन और जाति के बजाय पारिवारिक आय को आधार बनाने की मांग की जा रही है।
  • रिक्तियों और संविदा पर आरक्षित वर्ग की चिंता: आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार के मंत्रालयों में रिक्तियों की संख्या 2015 के 4.21 लाख से बढ़कर 8.24 लाख से अधिक हो गई है। वहीं, सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में नियमित पदों में 5.1 लाख की कमी आई है और संविदा (Contract) नौकरियों की हिस्सेदारी 19% से बढ़कर 49% हो गई है—जहां आरक्षण लागू नहीं होता।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: हालिया अदालती फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रारंभिक चरण में आरक्षित वर्ग की छूट लेने वाले अभ्यर्थी बाद में मेरिट पर सामान्य वर्ग की सीट का दावा नहीं कर सकते। साथ ही, एससी/एसटी वर्ग में उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) और क्रीमी लेयर की सशर्त अनुमति ने राज्यों के लिए नई प्रशासनिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

छात्र-छात्राओं के इस विमर्श से स्पष्ट है कि कानपुर विश्वविद्यालय के युवा केवल अपनी पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश की सबसे संवेदनशील सामाजिक और प्रशासनिक नीतियों पर भी गहरी और पैनी नजर रख रहे हैं।