IIT मद्रास के शोधकर्ताओं ने पक्षियों के पंखों से प्रेरित मॉर्फिंग स्किन तकनीक विकसित की है, जो विमान के पंखों पर हवा के प्रवाह को बेहतर बनाकर एयरोडायनामिक स्टॉल का खतरा कम करने में मदद कर सकती है।
News Desk | EdutechBharat.com
कल्पना कीजिए कि कोई विमान तेज हवा, अचानक बदलते मौसम या कम गति के कारण मुश्किल में फंसने लगे और उसके पंख हवा के बहाव के अनुसार खुद अपना आकार बदल लें। इससे पंखों पर हवा का प्रवाह बेहतर बना रहे और विमान को संतुलित रखने में मदद मिले। प्रकृति में पक्षियों के पंख कुछ इसी तरह काम करते हैं। अब इसी प्राकृतिक खूबी से प्रेरणा लेकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में विमानों की सुरक्षा और प्रदर्शन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इस तकनीक को ‘मॉर्फिंग स्किन’ (Morphing Skin) नाम दिया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह उड़ान के दौरान विमान के पंखों की सतह का आकार बदलकर हवा के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करती है। इससे एयरोडायनामिक स्टॉल (Aerodynamic Stall) के खतरे को कम करने की संभावना है। यह तकनीक न केवल विमानन सुरक्षा, बल्कि ड्रोन, मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) और रक्षा क्षेत्र के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।

क्या होता है एयरोडायनामिक स्टॉल, जिससे विमान को होता है खतरा?
विमान के पंखों का मुख्य काम हवा के प्रवाह की मदद से लिफ्ट यानी उठाव बल पैदा करना है। यही बल विमान को हवा में बनाए रखने में सहायता करता है। लेकिन जब पंख हवा की ओर बहुत अधिक कोण पर होते हैं, तो उनकी सतह पर बहने वाली हवा अलग होने लगती है। इसे फ्लो सेपरेशन (Flow Separation) कहा जाता है।
जब यह स्थिति गंभीर हो जाती है, तो पंखों की लिफ्ट में तेजी से गिरावट आ सकती है और ड्रैग बढ़ सकता है। विमान की इस स्थिति को एयरोडायनामिक स्टॉल कहा जाता है।
स्टॉल विशेष रूप से टेक-ऑफ, लैंडिंग और कम गति पर उड़ान के दौरान गंभीर चुनौती बन सकता है। हालांकि, स्टॉल का अर्थ यह नहीं है कि विमान का इंजन बंद हो गया है। यह मुख्य रूप से पंखों पर हवा के प्रवाह और लिफ्ट पैदा करने की क्षमता से जुड़ी स्थिति है।
ऐसे में यदि पंखों की सतह हवा के बदलते रुख के अनुसार खुद को ढाल सके, तो फ्लो सेपरेशन को नियंत्रित करने और स्टॉल की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है। IIT मद्रास की मॉर्फिंग स्किन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध प्रयास है।IIT मद्रास ने विकसित की नई कूलिंग तकनीक, ओवरहीटिंग से बचेंगे स्मार्टफोन, लैपटॉप और रक्षा उपकरण
20 साल से अधिक के शोध से विकसित हुई तकनीक
यह शोध IIT मद्रास के डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैकेनिक्स एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रिंकू मुखर्जी के नेतृत्व में किया गया।
शोध में एंटनी सैमुअल बी. ने न्यूमेरिकल मॉडलिंग पर काम किया, जबकि डॉ. अरित्रास रॉय और डॉ. रिंकू मुखर्जी ने विंड-टनल परीक्षण तथा तकनीक के प्रायोगिक प्रदर्शन में योगदान दिया।
इस शोध के निष्कर्ष एल्सेवियर (Elsevier) के पीयर-रिव्यूड जर्नल European Journal of Mechanics – B/Fluids में प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं का उद्देश्य केवल यह समझना नहीं था कि पंखों के आसपास हवा का प्रवाह अलग क्यों होता है, बल्कि इस वैज्ञानिक समझ को ऐसे वास्तविक उपकरण में बदलना भी था, जिसे विमान के पंखों पर इस्तेमाल किया जा सके।Hijli Jail जिसे भारत के प्रधानमंत्री ने बना डाला अंतरराष्ट्रीय इंजीनियरिंग संस्थान, 75 साल पुराने देश के First IIT की लंबी कहानी
कैसे काम करती है ‘मॉर्फिंग स्किन’?
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पंखों की पूरी संरचना को बदलने के बजाय उनकी सतह पर एक अतिरिक्त लचीली असेंबली लगाई जाती है। इसमें मैक्रो फाइबर कंपोजिट (Macro Fiber Composite—MFC) स्ट्रिप्स का इस्तेमाल किया गया है।
ये विशेष कंपोजिट स्ट्रिप्स विद्युत संकेत मिलने पर यांत्रिक रूप से प्रतिक्रिया कर सकती हैं। इस गुण का उपयोग लचीली सतह को नियंत्रित तरीके से मोड़ने और उसका आकार बदलने के लिए किया जाता है।
इसकी कार्यप्रणाली को तीन चरणों में समझा जा सकता है:
1. हवा के प्रवाह में बदलाव को पहचानना: पंखों की सतह के आसपास हवा के अलग होने की स्थिति को समझने और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था इस तकनीक का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
2. लचीली सतह का आकार बदलना: MFC स्ट्रिप्स की सहायता से जुड़ी सतह को आवश्यकतानुसार मोड़ा जा सकता है। इसके लिए पारंपरिक भारी मोटरों और जटिल मैकेनिकल लिंकेज पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया गया है।
3. हवा के प्रवाह को बेहतर बनाए रखने में मदद: सतह का बदला हुआ आकार पंखों पर हवा के प्रवाह को नियंत्रित करने में सहायता कर सकता है। इसका उद्देश्य फ्लो सेपरेशन को कम करना और अधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी पंखों की लिफ्ट क्षमता को बेहतर बनाए रखना है।
इस तरह यह तकनीक विमान के पंखों को पूरी तरह कठोर संरचना मानने के बजाय एक ऐसी सतह के रूप में देखती है, जो उड़ान की जरूरत के अनुसार अपना आकार बदल सकती है।
विंड-टनल में 3D विंग पर किया गया परीक्षण
किसी भी विमानन तकनीक को वास्तविक विमान में इस्तेमाल करने से पहले उसके व्यवहार को नियंत्रित परिस्थितियों में परखना जरूरी होता है। इसी उद्देश्य से शोधकर्ताओं ने इस मॉर्फिंग स्किन का परीक्षण मानक NACA 4415 एयरफॉइल वाले त्रि-आयामी (3D) विंग पर विंड-टनल में किया।

विंड-टनल में हवा की गति और प्रवाह जैसी परिस्थितियों को नियंत्रित करके यह अध्ययन किया जा सकता है कि पंखों के आसपास हवा किस तरह व्यवहार करती है और सतह में बदलाव से क्या प्रभाव पड़ता है।IIT Delhi ने बनाया पहला स्वदेशी Micro-GPU: सस्ते ई-रीडर्स और ई-रिक्शा में बदलेगी तकनीक, आयात पर घटेगी निर्भरता
इस परीक्षण का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी तकनीक का केवल कंप्यूटर मॉडल में प्रभावी दिखना पर्याप्त नहीं होता। उसे वास्तविक वायुगतिकीय परिस्थितियों में भी अपना प्रदर्शन साबित करना पड़ता है।
हालांकि, विंड-टनल में सफल परीक्षण को वास्तविक विमान में प्रमाणित सुरक्षा के बराबर नहीं माना जा सकता। इसके लिए आगे उड़ान परीक्षण, विभिन्न परिस्थितियों में प्रदर्शन का आकलन और विमानन सुरक्षा संबंधी प्रमाणन आवश्यक होंगे।
क्या पुराने विमानों में भी लगाई जा सकेगी यह तकनीक?
मॉर्फिंग स्किन का एक संभावित लाभ इसका अटैचमेंट आधारित डिजाइन है। यदि आगे के परीक्षणों में इसकी प्रभावशीलता और संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणित होती है, तो इसे कुछ मौजूदा विमानों में अतिरिक्त उपकरण के रूप में लगाने की संभावना तलाश की जा सकती है।
इससे हर स्थिति में पूरे पंख को नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन वास्तविक विमानों में इसका इस्तेमाल विमान के डिजाइन, वजन, पंखों की संरचना, रखरखाव और नियामकीय मंजूरी पर निर्भर करेगा।
इस तकनीक का उपयोग विशेष रूप से उन विमानों में उपयोगी हो सकता है, जिन्हें अलग-अलग गति, हवा के कोण और बदलती वायुमंडलीय परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
ड्रोन और रक्षा क्षेत्र में भी मिल सकते हैं फायदे
आज ड्रोन और मानवरहित हवाई वाहन निगरानी, मैपिंग, कृषि, आपदा प्रबंधन और रक्षा अभियानों में तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं। इनका आकार छोटा होने और वजन सीमित रहने के कारण इनके डिजाइन में हल्के तथा प्रभावी उपकरणों का विशेष महत्व है।
मॉर्फिंग स्किन जैसी तकनीक भविष्य में ऐसे विमानों के पंखों को उड़ान की परिस्थितियों के अनुसार ढालने में मदद कर सकती है। इससे कम गति पर नियंत्रण, हवा में स्थिरता और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रदर्शन बेहतर बनाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।
रक्षा क्षेत्र में इसका संभावित उपयोग ऐसे मानवरहित विमानों में हो सकता है, जिन्हें अलग-अलग मिशनों और वायुमंडलीय परिस्थितियों में उड़ान भरनी पड़ती है। हालांकि, सैन्य विमानों में इस्तेमाल के लिए भी व्यापक परीक्षण और सुरक्षा सत्यापन जरूरी होंगे।
क्या इससे ईंधन की बचत और उत्सर्जन में कमी आएगी?
विमानन क्षेत्र में ईंधन की खपत कम करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है। विमान के पंखों पर हवा का प्रवाह बेहतर बनाए रखने और अनावश्यक ड्रैग को कम करने वाली तकनीकें इस दिशा में योगदान दे सकती हैं।
यदि मॉर्फिंग स्किन अलग-अलग उड़ान परिस्थितियों में पंखों की वायुगतिकीय दक्षता बढ़ाने में सफल रहती है, तो भविष्य में इससे ईंधन दक्षता और उत्सर्जन में सुधार की संभावना बन सकती है।
हालांकि, वास्तविक ईंधन बचत कितनी होगी, यह विमान के प्रकार, उड़ान की अवधि, गति, वजन और तकनीक के समग्र प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। इसके लिए विस्तृत प्रयोगात्मक और उड़ान संबंधी आंकड़ों की जरूरत होगी।
पेटेंट के बाद अब वास्तविक उड़ान परीक्षण की दिशा में नजर
शोध से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इस तकनीक को पेटेंट कराया जा चुका है। शोध दल अब इसे वास्तविक विमान की उड़ान परिस्थितियों में परखने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
डॉ. रिंकू मुखर्जी के अनुसार, यह दो दशकों से अधिक समय तक चले अध्ययन का परिणाम है, जिसमें फ्लो सेपरेशन से जुड़े सिद्धांतों को एक व्यावहारिक उपकरण में बदलने का प्रयास किया गया है।
अब इस शोध की अगली महत्वपूर्ण कसौटी यह होगी कि मॉर्फिंग स्किन अलग-अलग गति, हवा के कोण और वास्तविक उड़ान परिस्थितियों में कितना प्रभावी प्रदर्शन करती है।
प्रकृति से सीखकर विमानन की नई तकनीक
पक्षियों के पंख हवा के बदलते रुख के अनुसार अपने आकार और स्थिति में बदलाव कर सकते हैं। इंजीनियरिंग के लिए यह लंबे समय से प्रेरणा का स्रोत रहा है। IIT मद्रास की मॉर्फिंग स्किन इसी बायोमिमिक्री (Biomimicry) यानी प्रकृति से प्रेरित तकनीक के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय प्रयास है।
यदि आगे के परीक्षणों में इसके लाभ प्रमाणित होते हैं, तो यह तकनीक विमान के पंखों को अधिक अनुकूलनशील बनाने, ड्रोन के प्रदर्शन में सुधार करने और विमानन सुरक्षा की नई संभावनाएं खोलने में योगदान दे सकती है।
फिलहाल, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे विमान स्टॉल की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। लेकिन पंखों की सतह को हवा के प्रवाह के अनुरूप ढालने का यह विचार भविष्य के अधिक स्मार्ट और अनुकूलनशील विमानों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है।
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