आईआईटी कानपुर बनाएगा हवा में स्थिर रहने वाली नायलॉन शटलकॉक, फेदर शटल का बन सकती है विकल्प
विंड टनल (Wind Tunnel) प्रयोग में नायलॉन और फेदर शटलकॉक के व्यवहार का खुलासा, ऑटोरोटेशन (Autorotation) से समझी उड़ान की स्थिरता; नई तकनीक से पशु क्रूरता कम होने की उम्मीद
कानपुर। बैडमिंटन में इस्तेमाल होने वाली सिंथेटिक यानी नायलॉन शटलकॉक (Synthetic/Nylon Shuttlecock) की उड़ान को अधिक स्थिर बनाने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर (IIT Kanpur) के शोध ने नई राह दिखाई है। संस्थान के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग (Aerospace Engineering) विभाग के प्रो. संजय मित्तल और छात्र मुकुल कुमार कंसारा ने विंड टनल (Wind Tunnel) में फेदर और सिंथेटिक शटलकॉक के व्यवहार का अध्ययन किया। प्रयोग में सामने आया कि हवा के दबाव में नायलॉन शटलकॉक का आकार बदलता है, जबकि पंखों से बनी फेदर शटलकॉक अपेक्षाकृत स्थिर रहती है।
शोध के निष्कर्षों के आधार पर अब ऐसी सिंथेटिक शटलकॉक विकसित करने की संभावना बन रही है, जो हवा के दबाव को सहन करते हुए अपना आकार और उड़ान की दिशा बनाए रख सके।
हवा के दबाव में टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है नायलॉन शटलकॉक
प्रो. संजय मित्तल के अनुसार विंड टनल परीक्षण (Wind Tunnel Testing) के दौरान अलग-अलग गति से हवा का प्रवाह शटलकॉक पर डाला गया। जब सिंथेटिक यानी नायलॉन से बनी शटलकॉक को तेज हवा का सामना करना पड़ा तो उसके स्कर्ट (Skirt) के आकार में बदलाव देखा गया। हवा का दबाव बढ़ने पर स्कर्ट टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा।
इसके विपरीत फेदर शटलकॉक (Feather Shuttlecock) के पंखों की संरचना में इस तरह का बदलाव नहीं देखा गया। नायलॉन शटलकॉक के आकार में परिवर्तन होने से उसकी वायुगतिकीय स्थिरता (Aerodynamic Stability) प्रभावित होती है और वह अपनी निर्धारित दिशा से भटक सकती है।
शटलकॉक के घूमने से जुड़ा है स्थिरता का विज्ञान
आईआईटी कानपुर के अध्ययन में शटलकॉक के स्वतः घूर्णन यानी ऑटोरोटेशन (Autorotation) को भी महत्वपूर्ण पाया गया। तेज प्रहार के बाद हवा के प्रवाह और खिंचाव (Drag) के कारण शटलकॉक अपने आप घूमने लगती है। हवा की गति बढ़ने के साथ उसकी घूर्णन गति भी बढ़ती है।
यह स्वतः घूर्णन शटलकॉक की उड़ान को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने हवा और शटलकॉक की संरचना के बीच होने वाली इस प्रक्रिया को द्रव-संरचना अंतःक्रिया (Fluid-Structure Interaction) के रूप में समझा है।
अब बनेगी हवा का दबाव सहने वाली नायलॉन शटलकॉक
शोध से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में सिंथेटिक शटलकॉक के डिजाइन (Synthetic Shuttlecock Design) को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। ऐसी शटलकॉक विकसित की जा सकती है, जिसका स्कर्ट हवा के दबाव में आसानी से विकृत न हो और तेज गति में भी अपना आकार बनाए रखे।
इससे नायलॉन शटलकॉक की उड़ान स्थिरता (Flight Stability) बेहतर होगी और उसके अपनी दिशा से भटकने की समस्या कम हो सकती है। इसका सीधा लाभ बैडमिंटन उपकरण (Badminton Equipment) के निर्माण में मिल सकता है।
फेदर शटलकॉक पर निर्भरता होगी कम
इस शोध का असर खेल विज्ञान (Sports Science) से आगे पशु कल्याण (Animal Welfare) तक पहुंच सकता है। पारंपरिक फेदर शटलकॉक बनाने में पक्षियों के पंखों का इस्तेमाल किया जाता है। यदि बेहतर उड़ान क्षमता वाली सिंथेटिक शटलकॉक (Synthetic Shuttlecock) विकसित होती है तो भविष्य में फेदर शटलकॉक की जरूरत और उत्पादन पर निर्भरता कम हो सकती है।
इससे मुर्गियों और अन्य पक्षियों के पंखों के इस्तेमाल की आवश्यकता घटेगी। परिणामस्वरूप खेल उपकरणों के निर्माण में पशु क्रूरता (Animal Cruelty) कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकेगा।
खेल तकनीक में नई दिशा देगा शोध
आईआईटी कानपुर का यह शोध (IIT Kanpur Research) सिर्फ शटलकॉक की उड़ान को समझने तक सीमित नहीं है। यह अध्ययन बताता है कि किसी खेल उपकरण की डिजाइन और उसके प्रदर्शन पर हवा का दबाव, घूर्णन और संरचनात्मक बदलाव किस तरह असर डालते हैं।
शोध के निष्कर्षों से अधिक टिकाऊ (Durable), स्थिर (Stable) और बेहतर प्रदर्शन वाली सिंथेटिक शटलकॉक तैयार करने की दिशा में काम किया जा सकता है। यदि इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर विकसित किया जाता है तो भविष्य में बैडमिंटन खिलाड़ियों को बेहतर शटलकॉक मिलने के साथ फेदर शटलकॉक के लिए पक्षियों के पंखों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
शोधकर्ता
प्रो. संजय मित्तल और मुकुल कुमार कंसारा
विभाग: एयरोस्पेस इंजीनियरिंग (Aerospace Engineering), आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur)
