IIT Kanpur के पूर्व छात्र अर्पित बंसल ने OpenAI के o1 मॉडल के विकास में अहम योगदान दिया। अब Meta की Superintelligence टीम में शामिल अर्पित के 800 करोड़ के पैकेज की चर्चा है।
ओपनएआई के चर्चित o1 रीजनिंग मॉडल (OpenAI o1 Reasoning Model) की नींव रखने वाले अर्पित बंसल ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को सिर्फ तेज नहीं, बल्कि जवाब देने से पहले ‘सोचने’ की दिशा में अहम योगदान दिया। आईआईटी कानपुर से शुरू हुआ उनका सफर आज दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी एआई प्रयोगशालाओं तक पहुंच चुका है। मीडिया रिपोर्टों में मेटा की ओर से उन्हें करीब 800 करोड़ रुपये के पैकेज की पेशकश की बात कही गई है।
एआई की गहराई समझने की चाह ने दिलाई मेटा में खास जगह
Kanpur: आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) के परिसर में 2007 में पहुंचे एक युवा छात्र ने इस प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला लिया। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही छात्र आने वाले वर्षों में दुनिया के चर्चित एआई शोधकर्ताओं में शामिल होगा।https://edutechbharat.com/bits-pilani-acyut-humanoid-robot-to-greyorange-startup-samay-kohli-akash-gupta/
यह युवा थे अर्पित बंसल। उन्होंने आईआईटी कानपुर में गणित और सांख्यिकी जैसे विषयों को चुना और 2007 से 2012 के बीच पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड डिग्री पूरी की। उस दौर में जब इंजीनियरिंग छात्रों के बीच कंप्यूटर साइंस सबसे लोकप्रिय विकल्पों में था, अर्पित ने गणितीय आधार को मजबूत करने का रास्ता चुना।
बाद में यही मजबूत गणितीय समझ मशीन लर्निंग (Machine Learning) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के क्षेत्र में उनके लिए बेहद उपयोगी साबित हुई।
आईआईएससी की लैब से अमेरिका तक
आईआईटी कानपुर से पढ़ाई पूरी करने के बाद अर्पित बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (Indian Institute of Science) पहुंचे। यहां मशीन लर्निंग लैब (Machine Learning Lab) में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में उन्होंने एआई की दुनिया में शोध का अनुभव हासिल किया।
इसके बाद उनका सफर अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट (University of Massachusetts Amherst) तक पहुंचा। यहां उन्होंने कंप्यूटर साइंस (Computer Science) में मास्टर्स और पीएचडी की।
उनकी शोध रुचियों में मशीन लर्निंग (Machine Learning), प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (Natural Language Processing), डीप लर्निंग (Deep Learning) और मेटा-लर्निंग (Meta-Learning) जैसे क्षेत्र शामिल रहे।
उनका शोध इस सवाल के आसपास भी रहा कि एआई सिस्टम कम उदाहरणों से नई चीजें सीखने और नए कार्यों को समझने में सक्षम कैसे बन सकते हैं।
विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 2021 में पीएचडी पूरी की।https://edutechbharat.com/iit-kanpur-first-cpv-sun-simulator-solar-energy-technology-india/
एक्सेंचर से ओपनएआई तक
अकादमिक शोध की दुनिया में पूरी तरह प्रवेश करने से पहले अर्पित ने 2012-13 में गुरुग्राम स्थित एक्सेंचर (Accenture) में विश्लेषक के रूप में पेशेवर करिअर शुरू किया।
इसके बाद उन्होंने फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई (OpenAI) जैसी वैश्विक तकनीकी कंपनियों में रिसर्च इंटर्नशिप और शोध से जुड़े अवसर हासिल किए।
जनवरी 2022 में उन्होंने ओपनएआई को बतौर शोधकर्ता ज्वाइन किया। यहीं उनके करिअर ने एआई की दुनिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया।
o1 मॉडल के पीछे ‘सोचने वाली एआई’ की अवधारणा
ओपनएआई के चर्चित o1 रीजनिंग मॉडल (o1 Reasoning Model) के विकास में अर्पित बंसल का महत्वपूर्ण योगदान बताया जाता है। इस मॉडल को प्रोजेक्ट स्ट्रॉबेरी (Project Strawberry) और प्रोजेक्ट क्यू (Project Q) जैसे नामों से भी जोड़ा गया।
पारंपरिक बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) मुख्य रूप से तेजी से उत्तर तैयार करने पर केंद्रित रहे हैं। इसके विपरीत o1 जैसे रीजनिंग मॉडल (Reasoning Models) में यह कोशिश की गई कि मॉडल किसी जटिल सवाल का उत्तर देने से पहले समस्या को अधिक गहराई से समझे और कई चरणों में उसका समाधान खोजे।
यानी एआई को सिर्फ तेजी से जवाब देने के बजाय जवाब देने से पहले अधिक सोचने की दिशा में ले जाने का प्रयास।
अर्पित ने सुदृढीकरण आधारित सीख (Reinforcement Learning) और एआई रीजनिंग (AI Reasoning) से जुड़े शोध पर काम किया और ओपनएआई के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक इल्या सुत्सकेवर के साथ भी शोध किया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पेश किए शोध
अर्पित का शोध केवल कंपनियों की प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आईसीएलआर (International Conference on Learning Representations), एसीएल (Association for Computational Linguistics) और ईएमएनएलपी (Empirical Methods in Natural Language Processing) जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित एआई और मशीन लर्निंग सम्मेलनों में शोध प्रस्तुत किए।
उनका एक शोध पत्र आईसीएलआर-2018 (ICLR 2018) में सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र के सम्मान से भी जुड़ा रहा।https://edutechbharat.com/old-phone-recycling-how-to-recycle-electronics/
उनके शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र एआई एजेंटों (AI Agents) के व्यवहार और उनके आपसी प्रतिस्पर्धा के माध्यम से जटिल क्षमताओं के विकसित होने को समझना रहा।
‘इमर्जेंट कॉम्प्लेक्सिटी वाया मल्टी-एजेंट कॉम्पिटिशन (Emergent Complexity via Multi-Agent Competition)’ जैसे शोध में यह समझने की कोशिश की गई कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस एजेंट एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं तो उनके व्यवहार में किस तरह की जटिलताएं उभर सकती हैं।
अब मेटा की सुपरइंटेलिजेंस टीम का हिस्सा
ओपनएआई के बाद अर्पित बंसल अब मेटा (Meta) की महत्वाकांक्षी सुपरइंटेलिजेंस टीम (Superintelligence Team) से जुड़े हैं। यहां वह अगली पीढ़ी के फ्रंटियर एआई मॉडल (Frontier AI Models) विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मेटा ने उन्हें आकर्षित करने के लिए करीब 800 करोड़ रुपये के पैकेज की पेशकश की। अगर यह आंकड़ा सही है, तो यह एआई प्रतिभाओं के लिए दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों के बीच चल रही होड़ को भी दिखाता है।
मेटा की टीम में वह लुकास बायर, अलेक्सांद्र कोलेस्निकोव और शियाओहुआ झाई जैसे एआई और कंप्यूटर विजन (Computer Vision) विशेषज्ञों के साथ काम कर रहे हैं।
अर्पित की कहानी में युवाओं के लिए क्या सीख?
अर्पित बंसल का सफर केवल बड़े पैकेज की कहानी नहीं है। इसकी सबसे बड़ी सीख यह है कि किसी क्षेत्र में असाधारण मुकाम हासिल करने के लिए विषय की गहरी समझ जरूरी है।
पहली सीख: सफलता के पीछे भागने के बजाय हर पड़ाव पर नई चीज सीखने की आदत विकसित करें।
दूसरी सीख: विशेषज्ञता केवल डिग्री या नौकरी के वर्षों से नहीं आती। किसी विषय की बुनियादी समझ और लगातार शोध ही वास्तविक विशेषज्ञता तैयार करती है।
तीसरी सीख: भीड़ जिस रास्ते पर जा रही हो, जरूरी नहीं कि वही आपके लिए सबसे बेहतर रास्ता हो। अर्पित ने कंप्यूटर साइंस के बजाय गणित और सांख्यिकी को आधार बनाया और यही मजबूत नींव बाद में उनके एआई शोध की ताकत बनी।
चौथी सीख: एआई जैसे तेजी से बदलते क्षेत्र में सीखना कभी खत्म नहीं होता। सवाल पूछना, प्रयोग करना और नई तकनीकों को समझना ही आगे बढ़ने का रास्ता है।
आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) से शुरू हुआ अर्पित बंसल का सफर इस बात का उदाहरण है कि गहरी पढ़ाई, शोध की जिज्ञासा और लगातार सीखने की क्षमता मिलकर किसी प्रतिभा को वैश्विक स्तर तक पहुंचा सकती है।
