आईआईटी कानपुर और गेट्स फाउंडेशन की साझेदारी, सस्ते डायग्नोस्टिक समाधान विकसित करने पर जोर
समन्वय-2026 में उद्योग, सरकार और अकादमिक जगत ने अनुसंधान आधारित नवाचार को बढ़ावा देने पर किया मंथन; मार्च 2029 तक एक अरब डॉलर जुटाने के अभियान की भी शुरुआत
नई दिल्ली/कानपुर, 16 अक्टूबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर ने उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित संस्थान के प्रमुख उद्योग-अकादमिक एवं नवाचार सम्मेलन ‘समन्वय-2026’ के तीसरे संस्करण में आईआईटी कानपुर और गेट्स फाउंडेशन ने स्थानीय स्तर पर विकसित, कम लागत वाले नैदानिक समाधान (डायग्नोस्टिक सॉल्यूशंस) आगे बढ़ाने के लिए साझेदारी की घोषणा की। इसका उद्देश्य इंजीनियरिंग, जैव प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से स्वास्थ्य जांच की तकनीकों को अधिक सुलभ बनाना है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में घोषित इस साझेदारी को भारत की स्वदेशी अनुसंधान एवं नवाचार क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। डॉ. सिंह सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचेगा अनुसंधान
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी, क्वांटम प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अगली औद्योगिक क्रांति की प्रमुख ताकत बनेंगी। भारत इन क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अनुसंधान के परिणामों को प्रयोगशाला से वास्तविक उपयोग और प्रोटोटाइप से व्यावसायिक उत्पाद तक पहुंचाने के लिए दीर्घकालिक साझेदारी जरूरी है। उन्होंने ‘समन्वय’ जैसे मंचों को विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान को ऐसे व्यावहारिक समाधानों में बदलना जरूरी है, जो लोगों के जीवन में सुधार लाएं। संस्थान अनुसंधान, उद्यमिता और उद्योग को जोड़कर राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों के समाधान विकसित करने पर काम कर रहा है। गेट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी से किफायती स्वास्थ्य जांच तकनीकों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
गेट्स फाउंडेशन की इंडिया कंट्री डायरेक्टर अर्चना व्यास ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और विनिर्माण क्षमता सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य तकनीकों की पहुंच बढ़ा सकती है। इस सहयोग का उद्देश्य विशेष रूप से उन समुदायों के लिए तेज और सुलभ नैदानिक समाधान विकसित करने की संभावनाएं तलाशना है, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं।
एआई से लेकर स्वास्थ्य तकनीक तक पर चर्चा
सम्मेलन में भारत के नवाचार भविष्य को आकार देने वाली उभरती प्रौद्योगिकियों, स्वास्थ्य सेवा में नवाचार तथा समाज के हित में तकनीक और अनुसंधान के उपयोग जैसे विषयों पर चर्चा हुई। मुख्य वक्ता मिरिक गोगरी ने अनुसंधान और नवाचार की भूमिका पर विचार रखे।

आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों ने भी भविष्य की चुनौतियों और तकनीकी समाधानों पर व्याख्यान दिए। गोल्डमैन सैक्स सस्टेनेबिलिटी चेयर के प्रोफेसर तरुण गुप्ता ने भारत के विकास के निर्णायक दशक में नवाचार की भूमिका, गैंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के डीन प्रो. अनिल के. ललवानी ने समावेशी स्वास्थ्य सेवा और कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने अनुसंधान को वास्तविक दुनिया में प्रभावी बनाने के लिए सहयोग की जरूरत पर प्रकाश डाला।
21 प्रदर्शकों ने दिखाए तकनीकी नवाचार
सम्मेलन की प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी में 21 प्रदर्शकों ने अपने अनुसंधान और तकनीकी समाधान प्रस्तुत किए। इनमें एंड्योरएयर, वाधवानी स्कूल ऑफ एआई एंड इंटेलिजेंट सिस्टम्स, सी3आई हब, अनंत सिस्टम्स, क्यूराडेव, क्यूट ब्रेन्स, ऑफग्रिड, स्कैननेक्स्ट, एयरावत रिसर्च फाउंडेशन और ब्रह्मियन स्पेसटेक सहित संस्थान एवं कंपनियां शामिल रहीं।
प्रदर्शनी में एयरोस्पेस, उन्नत सामग्री, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, टिकाऊ ऊर्जा, चिकित्सा प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और सटीक कृषि से जुड़े नवाचारों को प्रदर्शित किया गया।
मार्च 2029 तक एक अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य
आईआईटी कानपुर ने 14 अक्टूबर को नई दिल्ली में ‘ग्रेटर दैन अस’ अभियान की भी शुरुआत की। इसके तहत मार्च 2029 तक एक अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। जुटाई गई राशि से संस्थान की बुनियादी क्षमताओं को मजबूत करने, प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने तथा अत्याधुनिक अनुसंधान और नवाचार को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा।
समन्वय-2026 के माध्यम से आईआईटी कानपुर ने उद्योग और शोध संस्थानों के बीच साझेदारी को मजबूत करने तथा अनुसंधान को व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ने का संदेश दिया। सम्मेलन में स्वास्थ्य तकनीक के साथ विभिन्न उभरते क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देने पर भी जोर रहा।
