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EdutechBharat,com कानपुर, 23 सितंबर 2026। भविष्य की रणनीतिक हवाई प्रणालियों में दुश्मन के रडार से बचना केवल विमान की बाहरी बनावट तक सीमित नहीं रहेगा। एंटीना, सतह और विद्युत चुंबकीय व्यवहार को भी इस तरह नियंत्रित करना होगा कि हवाई प्लेटफॉर्म से रडार की ओर लौटने वाला संकेत कम हो। इसी चुनौती को लेकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT Kanpur) में स्टेल्थ एंटीना (Stealth Antenna), कम रडार क्रॉस-सेक्शन (Radar Cross-Section-RCS), पुनर्संयोज्य मेटासर्फेस (Reconfigurable Metasurface) और उन्नत विद्युत चुंबकीय सामग्री (Advanced Electromagnetic Materials) पर देशभर के रक्षा विशेषज्ञों ने मंथन किया।

मुख्य अतिथि डीआरडीओ के डीएफटीएम की उत्कृष्ट वैज्ञानिक एवं निदेशक डा. एन. रंजना का स्वागत किया गया।-iitk prof saikat of iitk is now fellow of IEEEorg


IIT कानपुर के विद्युत अभियंत्रण विभाग और डीआरडीओ-उद्योग-अकादमिक उत्कृष्टता केंद्र (DRDO-Industry-Academia Centre of Excellence-DIA-CoE) के तत्वावधान में तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें रक्षा अनुसंधान संगठनों, IIT, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उद्योग से जुड़े करीब 70 विशेषज्ञों ने भाग लिया।


रडार क्रॉस-सेक्शन क्या है और क्यों महत्वपूर्ण?

DRDO IIT Kanpur
रडार क्रॉस-सेक्शन (Radar Cross-Section-RCS) किसी वस्तु से रडार की ओर लौटने वाले विद्युतचुंबकीय संकेत की प्रभावशीलता से जुड़ा माप है। सरल भाषा में कहें तो किसी हवाई प्लेटफॉर्म से रडार को लौटने वाला संकेत जितना कम होगा, सामान्य परिस्थितियों में रडार के लिए उस प्लेटफॉर्म का पता लगाना उतना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

उद्धाटन अवसर पर उपस्थित अतिथि – iitk


इसीलिए स्टेल्थ तकनीक (Stealth Technology) में विमान की आकृति और सतह के साथ उसके एंटीना तथा अन्य विद्युतचुंबकीय घटकों की डिजाइन भी महत्वपूर्ण हो जाती है।Cyber Security Course in IIT


स्टेल्थ एंटीना से क्या बदलेगा?


हवाई प्लेटफॉर्म को संचार, दिशा-निर्धारण और सेंसर के लिए एंटीना की जरूरत होती है। लेकिन एंटीना स्वयं विद्युतचुंबकीय तरंगों के साथ प्रतिक्रिया करता है और प्लेटफॉर्म की पहचान को प्रभावित कर सकता है।

कार्यशाला में शामिल होने वाले प्रतिभागी व अतिथि- iitk


इसलिए स्टेल्थ एंटीना (Stealth Antenna) विकसित करने का उद्देश्य ऐसी एंटीना तकनीक तैयार करना है, जो जरूरी संचार और सेंसर क्षमता उपलब्ध कराए और साथ ही प्लेटफॉर्म की कम दृश्यता वाली विशेषताओं को बनाए रखने में मदद करे।


जरूरत के अनुसार बदल सकेगा विद्युतचुंबकीय व्यवहार


कार्यशाला में पुनर्संयोज्य विद्युतचुंबकीय संरचनाओं (Reconfigurable Electromagnetic Structures) और पुनर्संयोज्य मेटासर्फेस (Reconfigurable Metasurface) पर विशेष चर्चा हुई।


मेटासर्फेस ऐसी इंजीनियर्ड संरचनाएं हैं, जिन्हें विद्युतचुंबकीय तरंगों के साथ विशेष तरीके से प्रतिक्रिया करने के लिए डिजाइन किया जाता है। पुनर्संयोज्य तकनीक में इन संरचनाओं के विद्युत चुंबकीय व्यवहार को जरूरत और परिस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता विकसित करने पर जोर होता है।https://edutechbharat.com/iit-kanpur-next-generation-stealth-antennas-workshop-2026/


भविष्य की रणनीतिक हवाई प्रणालियों में यह क्षमता प्लेटफॉर्म को अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों के अनुरूप अधिक लचीला बनाने में उपयोगी हो सकती है।


केवल रडार नहीं, अवरक्त (Infrared ) पहचान भी चुनौती


विशेषज्ञों ने स्टेल्थ को केवल रडार से बचाव तक सीमित नहीं रखा। अवरक्त छलावरण (Infrared Camouflage), उन्नत विद्युतचुंबकीय सामग्री (Advanced Electromagnetic Materials) और स्टेल्थ प्रणालियों के विनिर्माण (Stealth Manufacturing) से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा हुई।


आधुनिक हवाई प्लेटफॉर्म को अलग-अलग सेंसर और प्रणालियों के माध्यम से पहचाना जा सकता है। ऐसे में कम दृश्यता वाली तकनीक विकसित करते समय रडार, विद्युतचुंबकीय और अवरक्त संकेतों को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।


15 तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने साझा किए शोध


तीन दिवसीय कार्यशाला में 15 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें स्टेल्थ एंटीना, RCS विश्लेषण (RCS Analysis), पुनर्संयोज्य मेटासर्फेस, अवरक्त छलावरण, उन्नत विद्युतचुंबकीय सामग्री, स्टेल्थ विनिर्माण तकनीक और रडार तकनीक (Radar Technology) प्रमुख विषय रहे।https://edutechbharat.com/amaravati-quantum-valley-india-first-indigenous-quantum-hardware-hindi-news/


इसके अलावा पैनल चर्चा, उद्योग संवाद और तकनीकी प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।


DRDO की प्रमुख प्रयोगशालाओं के विशेषज्ञ शामिल


कार्यशाला में आरसीआई (RCI), एडीई (ADE), एलआरडीई (LRDE), डीएलआरएल (DLRL), डीएमएसआरडीई (DMSRDE), आईटीआर (ITR), सीएफईईएस (CFEES) और सीईएमआईएलएसी (CEMILAC) समेत DRDO से जुड़े संस्थानों के विशेषज्ञों ने भाग लिया।
इसके अलावा विभिन्न IIT, IIIT, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और प्रौद्योगिकी कंपनियों के विशेषज्ञ भी शामिल रहे।https://edutechbharat.com/iit-bombay-low-cost-catalyst-green-hydrogen-production/


IIT कानपुर की प्रयोगशालाओं का भ्रमण


प्रतिभागियों ने IIT कानपुर की माइक्रोवेव मापन प्रयोगशाला (Microwave Measurement Laboratory), PCB प्रयोगशाला (PCB Laboratory), EMI/EMC प्रयोगशाला, NMWave रिसर्च लैब और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग की स्ट्रक्चर्स प्रयोगशाला का भ्रमण किया।
इस दौरान प्रतिभागियों को विद्युतचुंबकीय, माइक्रोवेव और एयरोस्पेस अनुसंधान तथा परीक्षण सुविधाओं को करीब से समझने का अवसर मिला।

डा. मीना मिश्रा को पौधा देकर सम्मानित करते प्रो. कुमार वैभव श्रीवास्तव- IITK


भारत की रक्षा जरूरतों के लिए क्यों अहम?


भारत की रणनीतिक हवाई प्रणालियों में आने वाले समय में कम दृश्यता, उन्नत सेंसर, सुरक्षित संचार और विद्युत चुंबकीय क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में स्टेल्थ एंटीना, कम RCS वाली संरचनाएं, पुनर्संयोज्य मेटासर्फेस और उन्नत विद्युतचुंबकीय सामग्री पर स्वदेशी अनुसंधान रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकता है।


इन तकनीकों के संभावित उपयोग रणनीतिक हवाई प्लेटफॉर्म के अलावा मानव रहित हवाई प्रणालियों (Unmanned Aerial Systems), रडार प्रणालियों और अन्य एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म में भी हो सकते हैं।


कार्यशाला का उद्देश्य मूलभूत विद्युतचुंबकीय अनुसंधान को रणनीतिक हवाई प्रणालियों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना रहा। इससे DRDO, शिक्षण संस्थानों और उद्योग के बीच शोध एवं तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने का अवसर मिला।


स्वदेशी स्टेल्थ तकनीक को नई दिशा


IIT कानपुर में आयोजित यह कार्यशाला भारत में अगली पीढ़ी की स्टेल्थ और विद्युत चुंबकीय तकनीकों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। स्टेल्थ एंटीना (Stealth Antenna), रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS), पुनर्संयोज्य मेटासर्फेस (Reconfigurable Metasurface) और उन्नत विद्युत चुंबकीय सामग्री भविष्य की रणनीतिक हवाई प्रणालियों को अधिक कम-दृश्यता वाली और परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।